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गर्त में गिरती नौकरशाही

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By सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

नई दिल्ली/ लखनऊ:भारत में नौकरशाही को अहम जिम्मेदारियों का पेशा माना जाता है. हर साल लाखों युवा केन्द्रीय लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में बैठते हैं. लेकिन मुद्दा यह है कि ब्यूरोक्रेसी के गलियारों की हालिया उथलपुथल इतनी सतही, बेबुनियादी और भ्रष्ट हो चुकी है, जिससे आने वाले समय में इस पेशे को संभवतः हमेशा संदेह की नज़रों से देखा जाएगा.

देश के कुछेक ‘ईमानदार’ नौकरशाहों के उदाहरण देखने होंगे ताकि मुद्दे को गहराई से समझा जा सके.

नंबर एक – अमित कटारिया

छत्तीसगढ़ के माओवादग्रस्त इलाके बस्तर में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहुंचे तो प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने बेहद गर्मजोशी के साथ मोदी की मुलाक़ात बस्तर के जिलाधिकारी अमित कटारिया से करायी. युवा जिलाधिकारी अमित कटारिया ने काला चश्मा लगाकर मोदी से हाथ मिलाया और यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी. डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग यानी डीओपीटी(DoPT) ने तुरंत अमित कटारिया को नोटिस जारी किया और उन्हें कोड और प्रोटोकॉल की हिदायत दी गयी. इसके बाद अमित कटारिया को सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त सपोर्ट मिला. लोग कहने लगे कि मोदी को कटारिया का चश्मा पहनना नागवार गुज़रा.

गर्त में गिरती नौकरशाही

अमित कटारिया

मामला यहीं नहीं रुका. अमित कटारिया की ईमानदारी की दुहाईयाँ दी जाने लगीं. यह बात सामने आयी कि कटारिया तनख्वाह के रूप में मात्र एक रूपए की टोकन राशि लेते हैं. जगदलपुर की पोस्टिंग के दौरान भी उनके यही चर्चे थे लेकिन अमित कटारिया की ईमानदारी की कहानी खुलने में देर नहीं लगी.

साल 2011 में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में अपनी पोस्टिंग के दौरान अमित कटारिया की पत्नी अस्मिता हांडा को जिंदल समूह की एयरलाईन इन्डियन फ्लाईसेफ़ एवियेशन लिमिटेड (इफ्साल) ने व्यावसायिक पायलट के पद पर नौकरी दे दी. अस्मिता हांडा की यह तैनाती तब हुई जब पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिल जाने के बाद जिंदल समूह इस क्षेत्र में 13 हजार करोड़ के बिजलीघर को लेकर जनसंघर्षों का सामना रहा था.

बाद में यह बात खुलकर सामने आई कि अस्मिता हांडा को नौकरी या तो अमित कटारिया की कोशिशों की वजह से मिली या उनके प्रभाव के कारण. मीडिया में आई खबरों का कटारिया ने एक दफा भी खंडन नहीं किया, अलबत्ता अपने सोशल सर्किल को और सिमटा लिया. ‘राजस्थान पत्रिका’ की तहकीकात का भरोसा करें तो रायगढ़ में कटारिया की पोस्टिंग के महज़ छः महीने बाद ही जिंदल समूह ने अस्मिता हांडा को नौकरी दे दी.

यह लोकसेवा की नियमावली कहती है कि केन्द्रीय संघ लोकसेवा आयोग का कोई भी प्रशासनिक अधिकारी किसी क्षेत्र में अपनी सेवा के दौरान अपने किसी रिश्तेदार को कहीं नौकरी नहीं दिलवा सकता है. यदि वह किसी सरकारी या गैर-सरकारी उपक्रम में अपने किसी रिश्तेदार को नौकरी दिलवाता है, तो उसे स्पष्टतः पद का दुरुपयोग माना जाएगा. यानी इस बात को जोर देकर कहा जा सकता है की अमित कटारिया ने अपने पद का दुरुपयोग किया.

नंबर दो – बी. चंद्रकला
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की डीएम बी. चंद्रकला को कौन नहीं जानता? सड़कों पर ईंटे बिछाने वाले ठेकेदार की क्लास लगाना हो या प्राथमिक विद्यालय में बच्चों के विकास को देखते हुए अध्यापकों की क्लास लगाना हो, हर जगह बी. चंद्रकला की ईमानदारी की दुहाई दी जाती रही है और उनकी पारदर्शिता के दाद दी जाती रही है.

गर्त में गिरती नौकरशाही

बी. चंद्रकला

लेकिन कुछ रोज़ पहले अपने साथ सेल्फ़ी लेने के बाद एक युवक को गिरफ्तार करवा देने के बाद बी. चंद्रकला फिर से सुर्ख़ियों में आ गयीं. हालांकि मामला यहीं नहीं रुका. जब बुलंदशहर के एक अखबार के पत्रकार ने बी. चंद्रकला को फोन किया और मामले पर उनका पक्ष जानना चाहा तो चंद्रकला अपना आपा खो बैठीं. चंद्रकला ने फोन करने वाले पत्रकार को ‘समझाया’ कि यदि उस पत्रकार की माँ-बहन के साथ कोई सेल्फी ले ले तो वह क्या करेगा? चंद्रकला यहीं नहीं रुकीं. इस बातचीत में चंद्रकला पत्रकार से यह कह रही हैं कि ‘भेजूं कुछ लोगों को आपके घर? लोग हैं हमारे यहां? वे जाएंगे तब आपको समझ में आएगा.’बी. चंद्रकला पत्रकार को पत्रकारिता भी सिखा रही हैं. यह बातचीत सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है. लोग व्हाट्सऐप पर शेयर कर रहे हैं.

अगले दिन जब अखबार ने इस पूरे वाकये को प्रमुखता से प्रकाशित किया तो बी. चंद्रकला का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. ब्यूरोक्रेट बी. चंद्रकला ने अखबार के ऑफिस के सामने दो ट्रक भरकर कूड़ा फिंकवा दिया. अखबार ने इसे भी पहले पेज की खबर बनाया और अब मामले में कोई नई गतिविधि नहीं है.

सोशल मीडिया पर सक्रिय प्रशासनिक अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश पर राज कर रही समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने बी. चंद्रकला की इन हरक़तों को जायज़ बताया है और मीडिया को आईना दिखाने वाला बताया है, लेकिन कई बुद्धिजीवियों और मीडियाकर्मियों ने इस घटना को नौकरशाही के लिए एक शर्मनाक वाकया बताया है. इस वाकये को ख़त्म करते-करते यह बता देना चाहिए कि बी. चंद्रकला की कुल संपत्ति महज़ दो साल में दस लाख से बढ़कर एक करोड़ से महज़ कुछ हज़ार कम रह गयी है.

अमित कटारिया और बी. चंद्रकला के वाकये कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे देश में नौकरशाही की परिभाषा तय हो रही है. भले ही ब्यूरोक्रेसी को बेहद सम्मानजनक और ईमानतलब पेशा माना जाता हो, लेकिन नौकरशाही के ऐसे वाकयों से इस मान्यता पर एक काला धब्बा लग जाता है. जिस अखबार के खिलाफ बी. चंद्रकला ने कार्रवाई की है, उस पर लम्बे समय से एकतरफा पत्रकारिता के आरोप लगते रहे हैं लेकिन एरिस्टोक्रेसी का पाठ पढ़ने वाले नौकरशाहों को कूड़ा फेंकने और ‘लोग भेजने’ की धमकी देने से अलग कोई कानूनी और सार्थक रास्ता देखना चाहिए, ऐसा जानकारों का कहना है. लेकिन अमित कटारिया और बी. चंद्रकला के विरोध में खबरें लिखने और पोस्ट लगाने वाले लोगों को समर्थकों से दो टूक बातें सुनने को मिल रही हैं.

अमित कटारिया और बी. चंद्रकला ने अपने फेसबुक पेज बना रखे हैं. हालांकि वे ऐसे अकेले नहीं हैं, कई आईएएस अधिकारियों ने अपनी लोकप्रियता की नुमाईश के लिए ऐसे फेसबुक पेज बनाए हैं. फेसबुक के साथ-साथ ऐसे सभी अधिकारियों के विकिपीडिया पेज भी बने हुए हैं, जिन पर उनके बारे में जानकारियां, उनके जीवन से जुड़े तथ्य और कुछ घटनाएं शामिल हैं.

गर्त में गिरती नौकरशाही

पूर्व नौकरशाह डीपी बागची इस बारे में मौजूदा अधिकारियों से अलग राय रखते हैं. वे कहते हैं, ‘किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को कार्यक्षेत्र में एक जिम्मेदारी के साथ पेश आना चाहिए. ज़रूरी है कि वह ज़मीन से जुड़ा रहे और अपने काम से ही मतलब रखे.’

गर्त में गिरती नौकरशाही

नौकरशाहों के सोशल मीडिया पर संलिप्तता के बाबत बागची कहते हैं, ‘मुझे तो हंसी आ रही है सोचकर कि आईएएस अधिकारियों के फेसबुक पेज और फैन पेज बने हुए हैं. ये किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है. मानता हूं कि सोशल मीडिया के आने के बाद इस पर रोकथाम बेहद मुश्किल है लेकिन किसी ब्यूरोक्रेट को बेहद लो-प्रोफाइल रहकर काम करना होगा. वो कोई फिल्म स्टार तो है नहीं जो अपने फैन बनाए. माने कि किसी भी संजीदा व्यक्ति को इस कृत्य पर हंसी आ सकती है.’

बी. चंद्रकला की कमोबेश सभी कार्रवाईयों के दौरान एक व्यक्ति मौजूद रहता है जो उनकी कार्रवाई का वीडियो बनाता है. बी. चंद्रकला के साथ पहले रह चुके एक सहायक नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि उस आदमी का काम ही वीडियो बनाना है, नहीं तो प्राइमरी स्कूल की कक्षा में कौन-सा बच्चा भला स्मार्टफोन या कैमरे से वीडियो बनाता फिरेगा. यहां यह प्रश्न उठता है कि अपनी कार्रवाईयों का वीडियो बनवाने वाले एक नौकरशाह को – जिसे उसके शहर के लोग हीरो की तरह मानते हैं – एक सेल्फी पर इतना बिफरना चाहिए कि सेल्फी लेने वाले व्यक्ति को जेल भेज दे. वह भी तब जब देश का प्रधानमंत्री सेल्फी लेने के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हो गया हो.

चूंकि बी. चंद्रकला का मुद्दा एकदम ताज़ा और नया है, इसलिए हमने बी. चंद्रकला का पक्ष जानने के लिए उन्हें फोन किया. तकरीबन दस बार फोन करने पर भी हर दफा चंद्रकला का सरकारी नंबर हर बार उनका कर्मचारी ही उठा रहा था और ‘मैडम से कुछ देर में बात हो पाएगी की दुहाई दे दे रहा था.’

हालांकि इन घटनाओं से इन नौकरशाहों के अपने काम के प्रति संजीदगी को नहीं नकारा जा सकता है. बागची कहते हैं, ‘मुझे भरोसा है कि ये लोग युवा हैं और अपने क्षेत्र में काम करके नयी मिसाल कायम करेंगे.’ लेकिन मीडिया में आने वाली रिपोर्ट इस सेवा में आगे आने की इच्छा रखने वाले युवाओं को ज़रूर भ्रमित कर सकती हैं.


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