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बलरामपुर : ओवैसी और नीतीश की सीधी टक्कर की जगह

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अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

बलरामपुर : बिहार-बंगाल की सीमा पर स्थित बलरामपुर विधानसभा क्षेत्र सीमांचल के कटिहार जिले का एक बदहाल इलाक़ा है. आज भी यहां गांव में बसने वाले लोग मीडिया व देश-दुनिया की ख़बरों से काफी दूर हैं. उनकी अपनी एक अलग दुनिया है. उनके इस दुनिया से दूर होने का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव में बसने वाले अधिकतर लोगों को पता नहीं कि असदुद्दीन ओवैसी कौन हैं? लेकिन हां! यहां के युवा सानिया मिर्जा को ज़रूर जानते हैं, क्योंकि वे भोजपुरी गानों में सानिया मिर्ज़ा का नाम खूब सुनते हैं.

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यहां रहमानपुर स्थित खानकाह सिर्फ़ इस क्षेत्र की ही नहीं, बल्कि राज्य की पहचान है. यहां सालाना आयोजित उर्स में बाहर से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं. तो वहीं गोरखनाथ मंदिर भी क्षेत्र की विशेष पहचान रखता है. पहले इस विधानसभा क्षेत्र का नाम बारसोई था, लेकिन 2010 के परिसीमन में इसे बदलकर बलरामपुर कर दिया गया.

कहने को तो यह मुस्लिम बहुल इलाक़ा है, जहां लगभग 66 फिसदी मतदाता मुसलमान हैं. दलित भी यहां तक़रीबन 10 फीसदी हैं. उसके बावजूद यहां भाजपा कई बार जीत चुकी है.

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इस बार यहां लड़ाई त्रिकोणीय नज़र आ रही है. यूं तो यहां 17 प्रत्याशी मैदान में हैं. लेकिन स्थानीय लोगों की मानें तो लड़ाई सिर्फ नेताओं के बीच ही है. सीपीआई (एमएल) (एल) के महबूब आलम, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (मजलिस) के मो. आदिल हसन आज़ाद और जदयू से बिहार के श्रम संसाधन मंत्री दुलालचन्द्र गोस्वामी के बीच कांटे की लड़ाई फंसी हुई है.

बारसोई में पान की दुकान चलाने वाले नुरूल इस्लाम बताते हैं, ‘इस बार लड़ाई तीन लोगों में है. लोगों में कंफ्यूज़न है कि कौन जीत रहा है. बस चुनाव के पहले वाली रात जिसकी हवा उड़ जाए, वह जीत जाएगा.’

लेकिन इमदाद अहमद का कहना है, ‘लड़ाई तो आदिल और महबूब में ही है. सांप्रदायिक आदमी सेकुलरिज़्म का अंगोछा डाल ले तो सेकुलर थोड़े ही न हो जाएगा. अब हमलोग सब समझ गए हैं. दुलालचन्द्र अब लड़ाई से बाहर हैं.’

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स्थानीय लोग बताते हैं कि दुलालचन्द्र गोस्वामी की पॉलिटिक्स बाबरी मस्जिद के साथ जुड़ी हुई है. तब उन्होंने बाबरी मस्जिद गिराने पर फ़क्र करते हुए उसकी ईंट दिखाकर लोगों से वोट की मांग की थी और कामयाब हुए थे. गोस्वामी ने 1995 में भाजपा के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की और दिलचस्प बात यह है कि वह मुसलमानों के वोट से ही जीते. उसके बाद लोगों को उनकी असलियत का पता चला तो वह कामयाब नहीं हुए, लेकिन फिर 2010 में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर गोस्वामी ने जीत दर्ज की और बिहार के श्रम संसाधन मंत्री बने.

पेशे से किसान ज़मीरूद्दीन का कहना है, ‘यहां लड़ाई महागठबंधन और वामदल के बीच ही है. ओवैसी के भाषण का यहां कोई खास असर होने वाला नहीं है. उनकी बातें हिन्दुस्तान को बांटने वाली हैं. इस बार हमारी मजबूरी है कि हमें नीतीश को किसी भी हाल में बचाना है.'

फरीद का मानना है, ‘यहां से दुलालचंद गोस्वामी और महबूब दोनों लोग विधायक रह चुके हैं, लेकिन इलाक़े के लिए कुछ भी नहीं किया. ऐसे में इस बार यहां ‘जय मीम-जय भीम’ और ‘बदलेगा बलरामपुर-बढ़ेगा बलरामपुर’ का नारा कामयाब रहेगा.’ दरअसल, ‘जय मीम-जय भीम’ का नारा असदुद्दीन ओवैसी ने चंद महीनों पहले महाराष्ट्र में दिया था, तो ‘बदलेगा बलरामपुर-बढ़ेगा बलरामपुर’ का नारा उनके प्रत्याशी आदिल हसन का है.

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सीपीआई (एमएल)(एल) के महबूब आलम साल 2000 में यहां से विधायक रह चुके हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्होंने भी इलाक़े की बदहाली दूर करने के लिए कुछ खास काम नहीं किया, बल्कि लोगों की समस्याओं में इज़ाफ़ा ही किया. यहां एक ऐसा तबक़ा भी है, जो इन्हें हराने के लिए वोट करता है. उनके आपराधिक रिकार्ड की भी यहां खूब चर्चा रहती है. इस बार खुद उन्होंने अपने हलफ़नामें में बताया है कि उनके उपर 13 मामले दर्ज हैं और ज़्यादातर हत्या जैसे गंभीर मामले हैं.

मो. आदिल हसन आज़ाद की पॉलिटिकल करियर की शुरूआत रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा से हुई. लोजपा के टिकट से पिछली बार चुनाव भी लड़े. लेकिन इस बार वह ओवैसी के साथ हैं. लोगों का मानना है कि आज़ाद सीमांचल के सबसे युवा उम्मीदवार हैं. उनके पिता ने बलरामपुर, खासतौर पर अपने गांव अझरैल, के लिए काफी कुछ किया है. वैसे पेशे से आदिल वकील हैं.

40 साल के मो. उस्मान का कहना है कि इस बार आदिल को मौक़ा देना चाहिए. वह युवा है. काम करने का जज़्बा है. बाकी दोनों उम्मीदवारों की छवि के मुक़ाबले उसकी छवि काफी बेहतर है. लोग वोट उसे ही करेंगे.

हालांकि यहां के लोग राजनीतिक रूप से परिपक्व हो चुके हैं. ज़्यादातर लोगों ने बातचीत में अपनी जागरूकता का परिचय दिया और किसे वोट करेंगे, इसका खुलासा करने से हर समय बचते रहें.

यदि आंकड़ों की बात करें तो स्पष्ट रहे कि यहां 2010 विधानसभा चुनाव में दुलालचंद गोस्वामी ने निर्दलीय चुनाव लड़कर सीपीआई (एलएल) के महबूब आलम को 2704 वोटों से मात दी थी.लेकिन इस बार यहां कौन किसे मात देगा, यह बात अभी तक स्पष्ट नहीं है. पिछले विधानसभा में यहां मतदान का प्रतिशत 63.27 रहा था. इस बार इसमें और इज़ाफ़ा होने की संभावना नज़र आ रही है.

बलरामपुर विधानसभा के चुनाव प्रत्याशी

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