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साम्प्रदायिक शक्तियों की ज़द में पहुंचता समस्तीपुर

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अफ़रोज़ आलम साहिल, TwoCircles.net

समस्तीपुर:जिस ज़मीन पर हमेशा धर्म-निरपेक्षता की फ़सल उगती रही है अब वहां भी साम्प्रदायिकता की आग का धुंआ दिखने लगा है. हमेशा एकजुटता व आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करने वाला समस्तीपुर इलाक़ा साम्प्रदायिकता और धर्म की राजनीति में झुलसता दिखाई दे रहा है. लोगों के अंदर एक अजीब-सी खामोशी है या यूं कहे एक डर भी, जो चौपालों व चाय की दुकानों पर छिपते-छिपाते बातों में ज़ाहिर हो ही जाता है.

इस खामोशी को तोड़ते हुए एडवोकेट रेयाज खान बताते हैं, ‘समस्तीपुर हमेशा से सोशलिस्ट बेल्ट रहा है. अब तक यहां कभी कोई दंगा नहीं हुआ. यहां के लोग कभी किसी के बहकावे में नहीं आते. लेकिन 2014 चुनाव से यहां का माहौल थोड़ा बदला है. कुछ तत्व हैं जो शहर का माहौल ख़राब करने की मंशा ज़रूर रखते हैं.’

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जब हमने रेयाज से खान से यह पूछा कि ये मंशा किस तरह की है और आपको क्यों ऐसा लगता है कि माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है? तो इस सवाल पर वे बताते हैं, ‘बात-बात में मुसलमानों को गाली देना. उनको पाकिस्तान भेज देने की बात करना अब आम बात है. बकरीद में कई गांव में बज़ाब्ता ऐलान किया गया कि गाय की कुर्बानी नहीं होनी चाहिए अन्यथा इसके परिणाम काफी बुरे होंगे.’ वे आगे बताते हैं कि रतवाड़ा में कुछ दिनों पहले कब्रिस्तान में हनुमान जी का मंदिर बनाने को लेकर विवाद हो चुका है. मंदिर बनाने वालों का कहना है कि हनुमान जी ने यहां जन्म लिया था, इसलिए मंदिर यहीं बनेगा.

तथ्य कहते हैं कि समस्तीपुर सिर्फ़ समाजवादियों का ही नहीं, बल्कि वामपंथियों का भी गढ़ रहा है. इसलिए यहां कभी भी दक्षिणपंथियों की दाल नहीं गली. मनीष के अनुसार ऐसे में उनके पास एक ही हथियार है और वह है साम्प्रदायिक तनाव फैलाकर वोटों का ध्रुवीकरण करना. मनीष बताते हैं कि 2014 लोकसभा चुनाव के पहले भी यहां ऐसा ही हथकंडा अपनाया गया था और काफी हद तक कामयाबी भी मिली थी.

मनीष के मुताबिक़ 2014 के फरवरी महीने में सिंघिया थाना के बेलाही गांव में कलश यात्रा के दौरान दो समुदायों के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इसमें एक दर्जन से अधिक लोग ज़ख्मी हुए थे. इस घटना को लेकर बेलाही गांव में काफी दिनों तक तनाव रहा था. दूसरी तरफ़ उसी महीने रोसड़ा शहर में भी रात मूर्ति विसर्जन के दौरान साम्प्रदायिक तनाव फैलाया गया था. इस तरह के कई छोटे-छोटे मामले खूब हुए थे.

मनीष आगे बताते हैं, ‘इस चुनाव में भी स्थिति कुछ वैसी ही है. अल्पसंख्यक तबका काफी डरा हुआ है. अच्छी सोच रखने वाला हर इंसान यही सोच रहा है कि किसी तरह से 12 अक्टूबर गुज़र जाए.’ मो. गुफ़रान भी बताते हैं कि धार्मिक बुनियाद पर माहौल ख़राब करने की कोशिश लगातार की जा रही है. भाजपा समर्थकों का स्पष्ट तौर पर खुलेआम कहते हुए आप सुन सकते हैं कि यहां सरकार भाजपा की ही बनेगी, चाहे जैसे भी हो. गुफ़रान बताते हैं कि, ‘यहां भड़काउ मामले आते रहते हैं, पर प्रशासन नियंत्रण कर लेती है.'

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आसिफ़ बख्तावर भी बताते हैं, ‘यहां हिन्दू जागरण मंच के लोग जागृति व जागरण के बहाने लोगों को हिन्दुत्व के साथ जोड़ रहे हैं. इनकी चाहत है कि किसी भी तरह से माहौल ख़राब हो, ताकि उसका फायदा 12 अक्टूबर को लिया जा सके, लेकिन लोगों की सूझबूझ व प्रशासन की चुस्ती के कारण वे अब तक कामयाब नहीं हो सके हैं.’

स्पष्ट रहे कि 04 मई 2015 को ज़िले के उजियारपुर थाना क्षेत्र के नाजिरपुर पंचायत में दो पक्षों के लोगों के बीच चल रहे भूमि विवाद को साम्प्रदायिक रंग दे दिया गया था, जिससे यहां काफी दिनों तक तनाव का माहौल रहा. इस मामले को प्रशासन ने गंभीरता से लिया और दोनों सम्प्रदाय से जुड़े प्रमुख लोगों की बैठक बुलाकर शांति व्यवस्था बनाने एवं ज़मीनी विवाद को हल करने पर सहमति बनाई. इससे पूर्व जनवरी महीने में वारिसनगर थाना क्षेत्र में मस्जिद की भूमि को लेकर चल रहे विवाद में एक हत्या के बाद पूरे इलाक़े में तनाव फैल गया था.

खैर, यहां अगर सीटों के आंकड़ों की बात करें तो इस ज़िला में कुल 10 विधानसभा सीट है. जिसमें से 2010 में 6 सीटें जदयू के खाते में गई थीं. 2 सीटों पर बीजेपी की जीत हुई थी वहीं 2 सीटें राजद के भी झोली में आई थी. यहां यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि 2010 में जदयू भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी. एक बात और भी स्पष्ट रहे कि राजद यहां 6 सीटों पर दूसरे स्थान रही थी. जदयू दो और लोजपा व सीपीएम एक-एक सीटों पर दूसरे स्थान पर रहे थे.

दरअसल, समस्तीपुर का इतिहास बताता है कि यहां हिंदू और मुसलमान दोनों धर्म के शासकों ने शासन किया है. उस ज़माने में भी यह इलाक़े आपसी एकता की प्रतीक रही है. शायद यही वजह है कि आज भी समस्तीपुर का सांप्रदायिक चरित्र समरसतापूर्ण है.

समस्तीपुर ही वह ज़मीन है, जहां आज से 25 साल पहले 25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए निकाली गई रथयात्रा को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव ने रोका था. आडवाणी की इस रथयात्रा का मक़सद राम मंदिर बनाना और मंडल कमीशन के लागू होने का विरोध करना था. आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ़्तार कर लिया गया था.

यह ज़मीन कर्पूरी ठाकूर जैसे समाजवादी नेताओं की जन्मस्थली रही है. लेकिन ऐसे में अब यहां धार्मिक कट्टरता के फ़सल उग रही है तो यह एक ख़तरनाक संकेत है. लेकिन इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि अभी भी कहीं न कहीं लोगों का आपसी भरोसा दिख ही जाता है. पर सवाल यह है कि क्या यह भरोसा समस्तीपुर के धर्मनिरपेक्षता के इतिहास को बचा पाएगा या यहां भी धार्मिक कट्टरता की आधार वाली राजनीति की कंटीली झाड़ियां उग आएंगी?


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