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‘मेरा जुर्म बस यह था कि मैंने पाकिस्तानी लड़की से प्यार किया’

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TwoCircles.net Staff Reporter

लखनऊ :‘उस वक्त जब मैं 18 साल का था और मैं टीवी मैकेनिक का काम करता था. मेरा बस जुर्म यह था कि मैंने पाकिस्तानी लड़की से प्यार किया था. मोहब्बत किसी सरहद की मोहताज नहीं होती. हम सब पूरी दुनिया में प्रेम-मोहब्बत से रहने की बात करते हैं, पर जिस तरह से सरहद पार मोहब्बत करने के नाम पर मेरी जवानी के साढ़े ग्यारह साल बरबाद किए उसकी कौन जिम्मेदारी लेगा? पुलिस ने मेरे प्रेम-पत्रों को मुल्क की गोपनीयता भंग कर आईएसआई का एजेंट बताया था. पोटा जैसे क़ानून के तहत मुझ पर मुक़दमा चलाया गया. ऐसे-ऐसे आरोप लगाए गए कि देश-दुनिया का हर शख्स सहम जाए.’

Mohd. Javed

साढ़े 11 साल ‘आतंकवादी’ के नाम पर जेल में रहने के बाद बाइज्ज़त बरी हुए 32 वर्षीय रामपुर निवासी मुहम्मद जावेद TwoCircles.net के साथ एक खास बातचीत में बताते हैं कि –‘सन् 1999 के जनवरी महीने में पहली बार अपनी मां के साथ पाकिस्तान गया था. दरअसल पाकिस्तान में मां के रिश्तेदार रहते हैं और वो उनसे मिलना चाहती थी. मैं अपनी मां के साथ पाकिस्तान पूरे साढ़े तीन महीने रहा. इस दौरान मुझे अपनी फूफी के लड़की पसंद आ गई. मुझे उससे प्यार हो गया. उसने भी मेरे प्यार के प्रोपोजल को क़बूल कर लिया. अब हम वापस अपने देश भारत आ चुके थे, लेकिन हम दोनों के बीच प्रेम-पत्र का आना-जाना लगा रहा. हम दोनों एक दूसरे को इतना चाहने लगें कि मैं दुबारा सन् 2000 के मार्च महीने में अकेले ही मिलने चला गया.’

इस खास बातचीत में जावेद बताते हैं कि –’10 अगस्त 2002 को अपने मैकेनिक की दुकान पर काम कर रहा था. कुछ पुलिस वाले सादे ड्रेस में आकर मुझे पूछताछ के नाम पर ज़बरदस्ती उठाकर ले आएं. मुझे दरअसल दिल्ली लाया गया. तीन दिन लगातार तरह-तरह से टार्चर किया गया. थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया गया. फिर भी जब मैं अपने सच पर क़ायम पर रहा तो मुझे थक-हार कर रामपुर में अदालत में पेश किया गया.’

जावेद बताते हैं कि –‘पूरे 11 साल 7 महीने रामपुर जेल में रहने के बाद आख़िरकार 18 जनवरी 2014 को मुरादाबाद की अदालत से रिहाई मिली. इस दौरान मुझे जो यातनाएं दी गईं उसे शब्दों में बता पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है. इस मुहब्बत ने तो मेरा सब कुछ ख़त्म कर दिया.’

जावेद बताते हैं कि –‘आज मैं अदालत से बाइज्ज़त बरी हो चुका हूं, पर मेरी गिरफ्तारी के लिए दोषी पुलिस वालों के खिलाफ़ कोई भी कार्यवाई नहीं हुई. आज बरी होने के बाद मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया है. मेरे घर में मेरे अब्बू, अम्मी और छोटे भाई और बहन की मेरे ऊपर जिम्मेदारी है, पर यह कैसे निभाउंगा? मैं इस पर कुछ सोच ही नहीं पा रहा हूं.’

जावेद के मुताबिक़ साढ़े 11 साल जेल में रहने के बाद बाइज्ज़त बरी होने के बावजूद आज तक सरकार ने पुर्नवास तो दूर सरकार का कोई नुमाइंदा उसे पूछने तक नहीं आया.

जावेद ने सरकार के सामने अपनी मांग रखते हुए कहते हैं कि –‘मैं सरकार से मांग करता हूं कि वो अपने चुनाव के समय किए गए वादे के मुताबिक़ वह मेरे और मेरे जैसे उन तमाम बेगुनाहों के पुर्नवास को सुनिश्चित करे, जिससे हम फिर से जिंदगी को पटरी पर ला सकें.’

जावेद से उनकी मुहब्बत यानी उस लड़की के बारे में सवाल पूछने पर वो बताते हैं कि –‘पता नहीं, अब वो कहां है? लेकिन है तो पाकिस्तान में ही. क्या पता अब तक उसका परिवार में कितने सदस्य बढ़ गए होंगे.’

ये पूछने पर कि अगर उन्होंने अभी तक शादी नहीं की होगी, तो क्या आप अभी भी उनसे शादी करना चाहेंगे? इस सवाल पर वो हंसते हुए बताते हैं –‘अभी तो सिर्फ प्यार किया था तो साढे ग्यारह साल जेल काटकर आया हूं, वो भी आतंकवादी व पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में... अब अगर शादी करने की सोचूंगा तो पता नहीं ये पुलिस पर मुझे ऐसे कितने आरोप लगाएंगे. ये प्यार तो मेरे लिए आग का दरिया साबित हुआ.’ फिर हंसते-हंसते जावेद मायूस हो जाते हैं.

जावेद कहते हैं कि अब अगले कई सालों तक तो शादी के बारे में सोच भी नहीं सकता. हालात ऐसे हो गए कि पता नहीं मैं खुद को कैसे ज़िन्दा रख पाउंगा, ये सोच कर ही परेशान हो जाता हूं. घर-परिवार सब बर्बाद कर दिया इन लोगों ने. मेरे घर में सबकी ज़िम्मेदारी मेरे ही उपर है, पता नहीं मैं इस ज़िम्मेदारी को कैसे निभा पाउंगा?

क्यों असदुद्दीन ओवैसी का ‘भारत माता की जय’ न बोलना एक सराहनीय फैसला है?

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By सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी का बयान कि वे भारत माता की जय नहीं बोलेंगे, की सराहना करने और उसे समर्थित करने के कई रास्ते खुले हुए हैं.

मुस्लिम समुदाय – और खासकर मुस्लिम समुदाय के उस हिस्से जहां असदुद्दीन ओवैसी और उनकी मजलिस का समर्थन का तबका खड़ा है – में यह अचम्भा, भय और संशय व्याप्त है कि असदुद्दीन ओवैसी के इस कथन के साथ खड़ा हुआ जाए या नहीं.

यह कहने में कम से कम गुरेज़ होना चाहिए कि हमें असदुद्दीन ओवैसी के इस कथन के साथ खड़े होना चाहिए. भले ही ओवैसी के राजनीतिक तरीकों से लाख शिकायतें हों, हम भले ही उसका साथ न देते हों लेकिन बैरिस्टर ओवैसी का यह कथन भारतीय परिवेश की उस बहस का एक बड़ा अध्याय है, जिसमें आज हर कोई देशद्रोह की चपेट में आ रहा है.

मोहन भागवत, सरसंघ संचालक, का यह आह्वान कि ओवैसी ‘भारत माता की जय’ बोलें का विरोध ज़रूरी है. एक, पहले तो किसी ऐसे संगठन के मुखिया – जो खुद नाज़ी जर्मनी से निकलकर आया हो – को देशप्रेम की बात करने का कोई अधिकार नहीं है और दो, जनता से प्रश्न रखा जाना चाहिए कि भारत को कितने माँ का दर्जा देते हैं? देते भी हैं या भारत को एक वतन की परिभाषा के बीच देखते हैं.

Asaduddin Owaisi in Bihar

असदुद्दीन ओवैसी का इनकार इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि यह उस मोहन भागवत के कथन की मुखालफ़त करता है, जिनकी सरपरस्ती में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बार-बार भारतीय मुसलमानों से देशप्रेम का सबूत माँगा है. यह कहने की ज़रुरत कतई नहीं है कि देशप्रेम के इस सर्टिफिकेशन के बीच कई बार जघन्य अपराध हुए हैं, लेकिन याद रखना ज़रूरी है.

जेएनयू के छात्र कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद के देशद्रोह प्रकरण के बाद यह ज़रूरी था कि किसी बड़े फलक से ‘देशद्रोह’ का स्वर उठे और सरकार का तात्कालिक रुख देखने को मिले. लेकिन हाल में ही दो ऐसे प्रकरण हुए जिनसे सरकार की नाक़ामी और लाचारी सामने ज़ाहिर हो जाते हैं. विश्व सांस्कृतिक समारोह, वर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल, के मंच से श्री श्री रविशंकर ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बगल में बैठकर पाकिस्तान ज़िन्दाबाद का नारा लगाया और दूसरी ओर ओवैसी ने भारत माता की जय बोलने से इनकार कर दिया.

इन दोनों हो वाकयों में किसी भी किस्म का देशद्रोह नहीं है, लेकिन वेंकैया नायडू की नज़र में सिर्फ ओवैसी ही दोषी हैं. यह भी ज़ाहिर है कि ओवैसी की यह हरक़त कितनी भी नागवार क्यों न हो, लेकिन मुस्लिम समुदाय के एक बड़े नेता के रूप में मशहूर ओवैसी के खिलाफ वे हथकंडे नहीं अपनाए जा सकते जो विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ अपनाए जा सकते हैं.

अपनी बिना पर यह कह सकता हूँ कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में आपको हर बार अपनी वतनपरस्ती ज़ाहिर करने की कोई ज़रुरत नहीं है. देशप्रेम का पैमाना सिर्फ ‘भारत माता की जय’ बोलना नहीं होता है. ओवैसी की द्वेषपूर्ण राजनीति से मुस्लिमों का कुछ भी भला नहीं होगा, यह तय है. लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी और देश को एक बाध्यता नहीं एक स्वतंत्रता की तरह देखने के मानी भी विकसित करने होंगे और यह हर हाल में ज़रूरी है.

कन्हैया का सहारा लेते हुए यह कहा जा सकता है कि मोहन भागवत की 'भारत माँ'में हमारी माँ और बहनें नहीं शामिल हैं. उनमें चलती गाड़ी में लड़की से बलात्कार करने वाले सेना के जवान हैं. गड़े मुर्दे के रूप में उखाड़ी हुई इशरत जहां नहीं शामिल है, और न तो हमारी माँ-बहनें ही शामिल हैं.

ओवैसी के कथन से इस बात पर बहस किसी भी हाल में नहीं लायी जा सकती है कि ओवैसी खुद को हिन्दुस्तानी मानते हैं या नहीं? किसी भी स्फीयर में, चाहे वह सेकुलर ही क्यों न हो, यदि बहस इस पर आ रही है तो वह निपट मूर्खता है. बहस इस पर होनी चाहिए कि शुद्ध रूप से राजनीतिक लड़ाई में जारी किए गए इस बयान के पीछे ओवैसी अपनी नादानी में वह हस्तक्षेप छेड़ बैठे हैं, जिसकी जानकारी शायद उन्हें खुद को नहीं थी.

कोई नहीं है भजनपुरा का फुरसा हाल लेने वाला...

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Anzar Bhajanpuri for TwoCircles.net

बिहार के कोसी क्षेत्र की पहचान दुनिया भर में है. 2008 की कोसी त्रासदी ने यहां की कठिन ज़िन्दगी और संघर्ष को सबकी आंखों के सामने ला दिया था. इस बाढ़ त्रासदी ने न सिर्फ़ इलाक़े को छितर-बितर कर दिया, बल्कि लोगों के भविष्य में भी अंधेरा बिखेर दिया था. लेकिन अब भी कोसी अंचल में जहां घूमिए गरीबी और भूख लोगों से लिपटी ही दिखाई देगी.

अंचल में एक से बढ़कर एक संघर्ष कथाएं हैं या फिर त्रासदियां. ऐसा ही एक हादसा है, जिसने इस अंचल को देश भर में फिर से सुर्खियों में ला दिया था.

3 जून, 2011 की तारीख़ थी. अररिया जिले के फारबिसगंज से लगे हुए गांव भजनपुरा में एक मामूली विवाद ने कई लोगों की जानें लील लीं. घटना के बाद दिल्ली से लेकर बिहार तक सियासत गरमा गई. भजनपुरा को लगा हादसे के बाद सियासतदां इस इलाक़े की सुध लेंगे. आलम यह है कि भजनपुरा मदद की आस में है और कोई फुरसा हाल लेने वाला नहीं...

3 जून 2011 को अररिया जिले में फारबिसगंज से लगे हुए भजनपुरा गांव में एक कारखाने की चारदीवारी को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ था. कारखाने के निर्माण को लेकर गांव वालों में रोष था. एक तरफ़ गांव वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, तो दूसरी तरफ़ कारखाने वालों की ओर से पुलिस प्रशासन पहुंच चुकी थी. इस बीच ग्रामीण वासी और पुलिस के बीच शुरुआती झड़प में पुलिस ने गोली चलाने का हुक्म दे दिया. इस गोली-बारी में 4 लोग हलाक हुए जबकि 15 से अधिक ज़ख्मी हो गए.

यह वही भजनपुरा है, जिस इलाक़े को सियासतदां मुख्य धारा से जोड़ देने का वादा करते रहे हैं. अब ज़रा इसकी हक़ीक़त भी जान लीजिए.

भजनपुर गांव में आज भी 80 फीसदी लोग छप्पर के घरों मे रहते हैं. इसमें से एक घर 38 वर्षीय भुट्टी बेगम का है. रहमो-करम पर जिंदगी काट रही भुट्टी बेगम का इस जिंदगी में कोई नहीं. मसलन जिस घर में वो जिंदगी काट रहीं हैं, वह भी उनका नहीं.

Bhajanpur

भुट्टी बेगम की 12 साल पहले समद नाम के एक आदमी से से शादी हुई थी. बदकिस्मती से दो साल बाद ही पति की मौत हो गयी. कोई बच्चा पैदा नहीं हुआ. लिहाजा भाई की बेटी मदीना साथ रहती है, जिसका स्कूल से कोई नाता नहीं है.

सरकारी दावे भले ही बड़े-बड़े हों, लेकिन भुट्टी को किसी भी तरह की बुनियादी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल सका है. न भुट्टी के पास कोई राशन कार्ड है न ही विधवा पेंशन. उनकी अपनी पहचान के लिए सरकार ने उन्हें मतदाता पहचान पत्र हाथों में थमा दिया है. लेकिन इस जम्हूरियत का रोना यह है कि यहां मतदाता सिर्फ बेबस इंसान है. यह तो एक बानगी भर है. कोसी क्षेत्र में जन-वितरण प्रणाली सिस्टम में भ्रष्टाचार लकड़ी में दीमक की तरह घुसा है.

Bhajanpur

तस्वीर खिंचवा कर भुट्टी अपना दर्द बयां करती हैं –कहती हैं कि कभी-कभी किसी के मार्फत मज़दूरी मिल जाती थी तो कभी खेत खलिहान में काम कर लेते थे. बाजार जाकर ईंट-पत्थर उठाते थे, लेकिन क़रीब चार महीने से कोई काम नहीं मिला है. आप सोचिए कैसे गुज़ारा होगा. कैसे पेट को रोटी मिले. पाई- पाई की मोहताजी चल रही है. वह उदास मन से रास्ते की तरफ़ देख रही हैं अब भी...

भुट्टी बेगम भजनपुरा की असली तस्वीर हैं. सरकार और प्रशासन का दावा है कि वह हमारी जिंदगी को बेहतर करने के लिए दिन-रात काम करता है. इस बात पर यक़ीन करने से पहले भुट्टी बेगम जैसे बेबस और लाचार लोगों की जिंदगी पर ज़रूर सोचना चाहिए...

(लेखक अंजर भजनपुरी 2011 से कोसी क्षेत्र मे सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियो मे संलग्न हैं. फिलहाल ‘मिसाल नेटवर्क’ के साथ जुड़े हैं. उनसे 7070507791 सम्पर्क किया जा सकता है.)

शराब के नशे में ‘पुलिस’ वाले ने मारी फ़रहान खान को गोली

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Fahmina Hussain, TwoCircles.net

नई दिल्ली :शराब के नशे में तथाकथित पुलिस वाले के द्वारा एक 25 वर्षीय युवक को गोली मारने की घटना सामने आई है.

प्राप्त सूचना के मुताबिक़ इस युवक का नाम फरहान खान है. फ़रहान फ़रीदाबाद के अल-फ़लाह यूनिवर्सिटी में बी.टेक फाईनल ईयर के छात्र हैं. वो उत्तर प्रदेश के हापुड़ ज़िला के रहने वाले हैं.

फ़रहान खान ने TwoCircles.netसे खास बातचीत में यह बताया कि वो जामिया नगर के हाजी कॉलोनी में रहते हैं. रात के क़रीब 10 बजे अपने भाई को लेने महारानी बाग गए थे. क्योंकि उनके भाई का ऑफिस वहीं है.

फरहान बताते हैं कि अपने भाई के ऑफिस के बाहर खड़े होकर वो भाई को फोन लगा रहे थे. तभी एक शख्स जो कि सिविल ड्रेस में था, साथ ही शराब भी पी रखी थी. आकर इसका फोन मांगने लगा. पूछने पर कि फोन क्यों दूं तो कहने लगा कि मैं पुलिस वाला हूं. तुम किससे बात कर रहे हो. इतने में मेरे बड़े भाई भी आ गए. साथ ही दो और लोग भी आ गए. वो भी खुद को पुलिस वाला बता रहे थे. मुझे व मेरे भाई को मारने लगे.

फरहान बताते हैं कि तीनों लोगों के पास पिस्टल था. और सब अपने आप को पुलिस वाला बता रहे थे. एक ने मेरे भाई के सीने पर पिस्टल रख दिया. दूसरे ने अचानक से अपने पिस्टल से फायरिंग कर दी. पहली गोली मुझे नहीं लगी. लेकिन दूसरे फायरिंग में एक गोली मेरे जांघ आकर लगी. उसके बाद वो लोग हमें वहीं छोड़ कर भाग गए. किसी तरह से भाई हमें होली फैमली अस्पताल में लाकर भर्ती कराया.

फ़रहान के मुताबिक़ उसकी गोली निकाल दी गई है और वो अब सही महसूस कर रहा है. फ़रहान ने यह भी बताया कि सुबह क़रीब 11 बजे न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी थाने से पुलिस वालों ने आकर उसका बयान दर्ज कर लिया है.

‘जन विकल्प मार्च’ पर लाठी चार्ज, महिलाओं से अभद्रता, कई कार्यकर्ता हुए चोटिल

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TwoCircles.net News Desk

लखनऊ :उत्तर प्रदेश की सामाजिक संगठन रिहाई मंच द्वारा आज लखनऊ में आयोजित ‘जन विकल्प मार्च’ पर पुलिस ने लाठी चार्ज की घटना सामने आई है.

रिहाई मंच के नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने महिला नेताओं से अभद्रता की और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर मारा-पीटा गया.

रिहाई मंच के नेताओं के मुताबिक़ –‘प्रदेश में सत्तारुढ़ अखिलेश सरकार द्वारा सरकार के चार बरस पूरे होने पर ‘जन विकल्प मार्च’ निकाल रहे लोगों को रोककर तानाशाही का सबूत दिया है.’

मंच ने अखिलेश सरकार पर आरोप लगाया कि जहां प्रदेश भर में एक तरफ संघ परिवार को पथसंचलन से लेकर भड़काऊ भाषण देने की आज़ादी है, लेकिन सूबे भर से जुटे इंसाफ़ पसंद अवाम जो विधानसभा पहुंचकर सरकार को उसके वादों को याद दिलाना चाहती थी, को यह अधिकार नहीं है कि वह सरकार को उसके वादे याद दिला सके. मुलायम और अखिलेश मुसलमानों का वोट लेकर विधानसभा तो पहुंचना चाहते हैं, लेकिन उन्हें अपने हक़-हुकूक़ की बात विधानसभा के समक्ष रखने का हक़ उन्हें नहीं देते.

अखिलेश सरकार पर लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने का आरोप लगाते हुए मंच ने कहा कि इस नाइंसाफी के खिलाफ़ सूबे भर की इंसाफ़ पसंद अवाम यूपी में नया राजनीतिक विकल्प खड़ा करेगी.

Jan Vikalp March

रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि जिस तरीके से इंसाफ़ की आवाज़ को दबाने की कोशिश और मार्च निकाल रहे लोगों पर हमला किया गया, उससे यह साफ़ हो गया है कि यह सरकार बेगुनाहों की लड़ाई लड़ने वाले लोगों के दमन पर उतारु है. उसकी वजहें साफ़ है कि यह सरकार बेगुनाहों के सवाल पर सफेद झूठ बोलकर आगामी 2017 के चुनाव में झूठ के बल पर उनके वोटों की लूट पर आमादा है. सांप्रदायिक व जातीय हिंसा, बिगड़ती कानून व्यवस्था, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिला, किसान और युवा विरोधी नीतीयों के खिलाफ़ पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत पूरे सूबे से आई इंसाफ़ पसंद अवाम की राजधानी में जमावड़े ने साफ़ कर दिया कि सूबे की अवाम सपा की जन-विरोधी और सांप्रदायिक नीतियों से पूरी तरह त्रस्त है.

उन्होंने कहा कि सपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को रिहा करेगी, उनका पुर्नवास करेगी और दोषियों के खिलाफ़ कार्रवाई करेगी, पर उसने किसी बेगुनाह को नहीं छोड़ा. उल्टे निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर कार्रवाई न करते हुए मौलाना खालिद मुजाहिद की पुलिस व आईबी के षडयंत्र से हत्या करवा दी. कहां तो सरकार का वादा था कि वह सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों को सजा देगी, लेकिन सपा के राज में यूपी के इतिहास में सबसे अधिक सांप्रदायिक हिंसा सपा-भाजपा गठजोड़ की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति द्वारा करवाई गई. भाजपा विधायक संगीत सोम, सुरेश राणा को बचाने का काम किया गया.

Shahnawaz Alam

उन्होंने कहा कि सपा सैफ़ई महोत्सव से लेकर अपने कुनबे की शाही विवाहों में प्रदेश के जनता की गाढ़ी कमाई को लुटाने में मस्त है. दूसरी तरफ़ पूरे सूबे में भारी बरसात और ओला वृष्टि के चलते फसलें बरबाद हो गई हैं और बुंदेलखंड सहित पूरे प्रदेश का बुनकर, किसान-मजदूर अपनी बेटियों का विवाह न कर पाने के कारण आत्महत्या करने पर मजबूर हैं.

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या और जेएनयू में कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान को देशद्रोही घोषित करने की संघी मंशा के खिलाफ़ पूरे देश में मनुवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ़ खड़े हो रहे प्रतिरोध को यह ‘जन विकल्प मार्च’ प्रदेश में एक राजनीतिक दिशा देगा.

उन्होंने कहा कि बेगुनाहों, मजलूमों के इंसाफ़ का सवाल उठाने से रोकने के लिए जिस सांप्रदायिक जेहनियत से ‘जन विकल्प मार्च’ को रोका गया, ये वही जेहनियत है जो जातिवाद-सांप्रदायिकता से आजादी के नाम पर जेएनयू जैसे संस्थान पर देश द्रोही का ठप्पा लगाती है.

उन्होंने कहा कि सपा के चुनावी घोषणा पत्र में दलितों के लिए कोई एजेण्डा तक नहीं है और खुद को दलितों का स्वयं भू-हितैषी बताने वाली बसपा के हाथी पर मनुवादी ताक़तें सवार हो गई हैं. प्रदेश में सांप्रदायिक व जातीय ध्रुवीकरण करने वाली राजनीति के खिलाफ़ रिहाई मंच व इंसाफ़ अभियान का यह ‘जन विकल्प मार्च’ देश और समाज निर्माण को नई राजनीतिक दिशा देगा.

Jan Vikalp March

इंसाफ़ अभियान के प्रदेश प्रभारी राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि सपा सरकार के चार बरस पूरे होने पर यह जन विकल्प मार्च झूठ और लूट को बेनकाब करने का ऐतिहासिक क़दम था. सरकार के बर्बर, तानाशाहपूर्ण मानसिकता के चलते इसको रोका गया, क्योंकि यह सरकार चौतरफा अपने ही कारनामों से घिर चुकी है और उसके विदाई का आखिरी दौर आ गया है. अब और ज्यादा समय तक सूबे की इंसाफ़ पसंद आवाम ऐसी जन-विरोधी सरकार को बर्दाश्त नहीं करेगी.

सिद्धार्थनगर से आए रिहाई मंच नेता डॉ. मज़हरूल हक़ ने कहा कि मुसलमानों के वोट से बनी सरकार में मुसलमानों पर सबसे ज्यादा हिंसा हो रही है. हर विभाग में उनसे सिर्फ़ मुसलमान होने के कारण अवैध वसूली की जाती है. उन्हें निरंतर डराए रखने की रणनीति पर सरकार चल रही है. लेकिन रिहाई मंच ने मुस्लिम समाज में साहस का जो संचार किया है, वह सपा के राजनीतिक खात्में की बुनियाद बनने जा रही है.

वहीं गोंडा से आए जुबैर खान ने कहा कि इंसाफ़ से वंचित करने वाली सरकारें इतिहास के कूड़ेदान में चली जाती हैं. सपा ने जिस स्तर पर जनता पर जुल्म ढाए हैं, मुलायाम सिंह के कुनबे ने जिस तरह सरकारी धन की लूट की है उससे सपा का अंत नज़दीक आ गया है. इसलिए वह सवाल उठाने वालों पर लाठियां बरसा कर उन्हें चुप कराना चाहती है.

मुरादाबाद से आए मोहम्मद अनस ने कहा कि आज देश का मुसलमान आजाद भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा डरा और सहमा है. कोई भी उसकी आवाज़ नहीं उठाना चाहता. ऐसे में रिहाई मंच ने आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों के फंसाए जाने को राजनीतिक मुद्दा बना दिया है, वह भविष्य की राजनीति का एजेंडा तय करेगा.

प्रदर्शन को मैगसेसे अवार्ड से सम्मानित संदीप पांडे, फैजाबाद से आए अतहर शम्सी, जौनपुर से आए औसाफ़ अहमद, प्यारे राही, बलिया से आए डॉ. अहमद कमाल, रोशन अली, मंजूर अहमद, गाजीपुर से आए साकिब, आमिर नवाज़, गोंडा से आए हादी खान, रफीउद्दीन खान, इलाहाबाद से आए आनंद यादव, दिनेश चौधरी, बांदा से आए धनन्जय चौधरी, फरूखाबाद से आए योगेंद्र यादव, आज़मगढ़ से आए विनोद यादव, तारिक़ शफ़ीक़, शाह आलम शेरवानी, तेजस यादव, मसीहुद्दीन संजरी, सालिम दाउदी, गुलाम अम्बिया, सरफ़राज़ क़मर, मोहम्मद आमिर, अवधेश यादव, राजेश यादव, उन्नाव से आए ज़मीर खान, बनारस से आए जहीर हाश्मी, अमित मिश्रा, सीतापुर से आए मोहम्मद निसार, रविशेखर, एकता सिंह, दिल्ली से आए अजय प्रकाश, प्रतापगढ़ से आए शम्स तबरेज़, मोहम्मद कलीम, सुल्तानपुर से आए जुनैद अहमद, कानपुर से आए मोहम्मद अहमद, अब्दुल अजीज़, रजनीश रत्नाकर, डॉ. निसार, बरेली से आए मुश्फिक अहमद, शकील कुरैशी, सोनू आदि ने भी सम्बोधित किया. संचालन अनिल यादव ने किया.

पोस्ट-मैट्रीक छात्रवृति हेतु ऑनलाइन आवेदन की आज आख़िरी तारीख़, बढ़ाने की हो रही है मांग

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TwoCircles.net News Desk

पटना :सरकार द्वारा छात्रों को पोस्ट मैट्रीक छात्रवृति (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति) हेतु ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि 17 मार्च 2016 तक तय की गई है, परंतु अभी तक छात्रों का एक बड़ा तबक़ा आवेदन नहीं कर पाई है.

आपको बताते चलें कि अपनी विभिन्न मांगों को लेकर विश्वविद्यालय व अंगीभूत कॉलेजों के 33 हज़ार कर्मचारी 15 मार्च को सामूहिक अवकाश पर चले गए थे, जिसके कारण इस दिन छात्रों का कॉलेज द्वारा छात्रवृति हेतु आवेदन प्रक्रिया नहीं हो सका. साथ ही मैट्रीक व इंटर की परीक्षा का सेन्टर कॉलेजों में पड़ने के कारण, कॉलेज द्वारा समय अवधि में भी फेर-बदल के कारण छात्रों को काफी परेशानी हो रही है.

ऑल इंडिया स्टूडेन्ट फेडरेशन (एआईएसएफ) के जिला अध्यक्ष महेश कुमार ने सरकार से मांग किया है कि छात्रों की परेशानी एवं शैक्षणिक भविष्य को देखते हुए ऑनलाइन आवेदन की तिथि कम से कम एक महीना के लिए बढ़ाई जाए, ताकि छात्र-छात्राएँ ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया को पूरी कर सके एवं कोई छात्र वंचित न रह पाए.

उन्होंने कहा कि यह सिर्फ़ किसी एक ज़िला का मसला नहीं, बल्कि पूरे राज्य का मसला है. छात्रों में इस बात को लेकर काफी आक्रोश है. अगर तिथि नहीं बढ़ाई गई, तो छात्र आंदोलन करने को विवश होंगे.

उन्होंने कल्याण मंत्री से जल्द से जल्द तिथि बढ़ाने की दिशा में पहल करने की मांग की. साथ ही सरकार से हम यह भी मांग करते हुए कहा है कि –‘पिछली सत्र की छात्रवृत्ति की राशि छात्रों को जल्द से जल्द छात्रों के खाता में भेजी जाए, ताकि उनका शैक्षिक कार्य बाधित न हो.’

नवादा के कझिया गांव में सामंतों ने लगाया महादलितों के घरों में आग, वाम दलों ने सरकार से पक्के मकान देने की रखी मांग

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TwoCircles.net News Desk

पटना :नवादा ज़िले के अकबरपुर प्रखंड अन्तर्गत कझिया गाँव में वर्षों से बसे लगभग एक सौ महादलितों के घर में सामंती गुण्डों द्वारा पिछले हफ्ते मंगलवार को आग लगाने एवं हमला करने का मामला सामने आया है. सामंतों के इस कुकृत का वाम दल भाकपा, माकपा एवं फारवर्ड ब्लॉक ने घोर निन्दा की है.

इस घटना के बाद वामदलों का एक जांच दल 14 मार्च को घटना स्थल पर गया. जांच दल में माकपा के राज्य सचिव अवधेश कुमार, राज्य कमिटी सदस्य उमेश प्रसाद, एवं उपेन्द्र चौरसिया भाकपा के राज्य कार्यकारिणी सदस्य अर्जुन प्रसाद सिंह, नवादा जिला सचिव रामकिशोर शर्मा तथा फारवर्ड ब्लॉक के नेता दिनेश कुमार शामिल थे.

घटना स्थल का निरीक्षण, पीडि़त महादलित परिवार से मिलने एवं स्थानीय लोगों से पूछ-ताछ के बाद जांच-दल इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि उक्त ज़मीन पर नवधनाढ़ वर्ग के लोगों की नज़र गड़ी हुयी है. वे वहां से ग़रीब भूमिहीन महादलित परिवार को उजाड़ कर उस कीमती सरकारी ज़मीन पर क़ब्जा कर लेना चाहते है.

जांच दल को यह भी जानकारी मिली कि सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाली ताक़त इस घटना के पीछे लगी हैं. पीडि़त लोगों ने यह भी बताया कि गत वर्ष भी दर्जनों घरों को जला दी गयी थी.

वामदलों के जांच दल ने इस गांव से लौटने के बाद नीतिश सरकार से अपनी मांग रखते हुए कहा है कि –‘वहां बसे सभी परिवारों को वासगीत का पर्चा दिया जाय तथा इंदिरा आवास के तहत पक्का मकान दिया जाय. साथ ही जले मकानों एवं समानों की क्षतिपूर्ति दी जाय, अग्नि पीडि़तों को मुफ्त में राशन-किरासन, पॉलीथिन एवं अन्य आवश्यक समानों को शीघ्र मुहैय्या किया जाय.

इस जांच दल ने यह भी मांग रखा कि –‘कम से कम इस गांव में पांच चापाकल लगवाया जाय.’

जांच दल में शामिल वामपंथी नेताओं ने दोषियों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं होने पर रोष प्रकट करते हुए अविलम्ब गिरफ्तार करने की मांग भी उठाई है.

रोज़मर्रा की जंग से जूझते सलाउद्दीन, हंसी उड़ाती योजनाएं...

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Noor Islam for TwoCircles.net

दरभंगा :यह सलाऊद्दीन कुरैशी का परिवार है. सरसरी नज़रों से देखें तो यह परिवार भी बेहद सामान्य जिंदगी गुज़ार रहा है. इसमें नज़रों का कोई क़सूर नहीं. यह हमारी आदत में शुमार है कि ग़रीबी और बदहाली को देखकर हमारी रगों में खून नहीं दौड़ता.

इस देश में लाखों की तादाद में कुरैशी जैसे परिवार रात में इस मिन्नत के साथ सो जाते हैं कि जब उजाला हो तो कुछ उद्यम हमारे लिए भी बचा रहे. दरभंगा शहर के उर्दू बाज़ार में रहने वाले इस परिवार की कहानी भी उन कहानियों से साम्य रखती है, जिन्हें हम ग़रीब और बदहाल कह कर अपनी जिम्मेदारी को पूरा मान लेते हैं...

Salahuddin Qureshi

सलाऊद्दीन न ज़मींदार हैं न नंबरदार. एक कमरे के घर में जिंदगी गुज़र-बसर करने वाले सलाउद्दीन अकेले नहीं हैं. इनके परिवार में कुल 8 सदस्य मौजूद हैं. खाने को नहीं जुटता, लेकिन यह सलाऊद्दीन की सलाहियत है कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजते हैं. यह बात अलग है कि उन्होंने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा.

सरकारी योजनाएं इस घर से रूठी मालूम होती हैं. न सलाऊद्दीन किसी से अपनी बात रख पाते हैं न कोई हुक्काम इनकी बात सुनने में दिलचस्पी रखता है. न सरपंच की दालान में इनकी उपयोगिता है और न ही इन्हें समाज में एक इज्ज़तदार जिंदगी हासिल है.

हर कहीं से मार खाए सलाउद्दीन कहते हैं कि रोज़मर्रा की जिंदगी को चलाए रखने के लिए काम ढूंढना बेहद मुश्किल होता है. सलाउद्दीन का यह बयान सरकार के ज़रिए सभी को रोज़गार मुहैया कराए जाने के दावे की पोल खोलता है.

ब्यूरोक्रेसी की ठसक गांव में सरपंच के दालान तक पहुंचकर फुस्स हो जाती है. ख़ामियाज़ा सलाऊद्दीन जैसे परिवारों को उठाना पड़ता है. आठ जिंदगियों की लौ जलाए रखने के लिए सलाउद्दीन ज़बरदस्त मेहनत करते हैं.

वे कहते हैं कि एक दिन चूक जाओ तो चूल्हा जलना मुश्किल होता है. आप ही बताइए इस महंगाई के दौर में दो वक्त की रोटी, बच्चों को स्कूल भेज पाना आसान है क्या?

सलाउद्दीन कहते हैं कि घर की लड़कियां बोझ नहीं होतीं, लेकिन ग़रीबी इस बात का हमेशा अहसास कराती रहती है. इस जिल्लत की जिंदगी से बेहतर है कि खुदा हमें जल्द से जल्द इस दुनिया से रुख्सत कर दे.

वो कहते हैं कि मैं नाउम्मीद नहीं हूं, लेकिन हमारी हालात का भी कोई जायज़ा ले. योजनाएं तो सैकड़ों आती हैं, लेकिन हम इसका फ़ायदा नहीं जानते. न हमें कोई आजतक इसकी जानकारी देने आया. इस सोच से बच्चों को पढ़ने-लिखने के लिए भेजता हूं कि कम से कम वे दुनियावी दांव-पेंच सीख लें. उन्हें हमारी तरह घुरच-घुरच कर जीवन न बिताना पड़े.

Salahuddin Qureshi

सलाउद्दीन कुरैशी की पत्नी शाजरा खातून बताती हैं कि पूरा दिन पहाड़ के मानिंद लगता है. जब तक साहब काम से नहीं लौटते तब तक दिल बेचैन रहता है कि बच्चों को आज क्या नसीब होगा. हम उन परिवारों की गिनती में भी नहीं आएंगे जिनके घरों में अनाज जमा कर रखा जाता है. यहां रोज की मेहनत से ही पेट की आग शांत होती है. हमें अपनों से ज्यादा बच्चों की फिक्र रहती है, आखिर इनकी भूख को कैसे शांत किया जाए. कई दफ़ा तो यह स्थिति भी बनती है कि मिन्नतों और जारियों से ही बच्चों की भूख शांत करनी पड़ती है. लेकिन भूख से बिलबिलाते बच्चे बाजुओं में भी नहीं संभलते.

सलाउद्दीन का परिवार और उनकी सपाट बातें आपके दिल में तो जगह बना लेती हैं, लेकिन उन्हें कौन समझाए जिन्हें देश और इनकी बेहतरी के लिए चुनकर देश की संसद में भेजा गया है. सलाउद्दीन जैसे कितने परिवार हैं जिन्हें अपनी बात रखने के लिए मंच भी मुहैया नहीं है. वे हमें पाकर बेहद आशावान हुए, लेकिन हम भी उनकी बात लिखने के सिवा मजबूर ही नज़र आते हैं...

(लेखक नूर इस्लाम दरभंगा निवासी हैं. परास्नातक करने के बाद दीन-दुखिया के हक़-हकूक़ की लड़ाई लड़ते हैं. फिलहाल ‘मिसाल नेटवर्क’ से जुड़े हैं. इनसे 7070852322 पर संपर्क किया जा सकता है.)

‘आतंकवाद’ के आरोप से बरी वासिफ़ के 12 वर्षीय बेटी को जान से मारने की धमकी

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By Farhana Riyaz

कानपुर :उत्तर प्रदेश के ज़िला कानपुर के हुमायूं बाग में रहने वाले सैय्यद वासिफ़ हैदर की 12 वर्षीय बेटी को जान से मारने की धमकी दी गयी है.

पिता वासिफ़ के मुताबिक़ उनकी 12 वर्षीय बेटी मनाल जो सेंट मेरी कान्वेंट हाई स्कूल छावनी में कक्षा 6 की छात्रा है, को 27 जनवरी को स्कूल की छुट्टी के बाद जैसे ही वो स्कूल से बाहर आई, एक व्यक्ति ने उसका हाथ पकड़कर उठाने की कोशिश की. इसका बच्ची ने विरोध किया. ऐसे में भीड़ होने की वजह से वो सिर्फ़ इतना कहकर चला गया कि ‘अपने अब्बा से कहो कि केस न लड़ें, वर्ना तुम्हें जान से मार दूंगा. जिसके बाद वो किसी तरह घर वापस आई और घर आते ही बेहोश हो गयी. परिवार वालों ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया, जहां 2 दिन बेहोश रहने के बाद वह होश में आई और परिवार वालों को सारी घटना के बारे में बताया.

इस 12 वर्षीय बच्ची के मुताबिक़ जिस व्यक्ति ने धमकी दी, उसका हुलिया चेहरा गोल, बाल सीधे सांवले रंग का औसत क़द का व्यक्ति था और उसने धूप का चश्मा लगाया हुआ था.

जिस दिन इस बच्ची के साथ ये घटना हुई वासिफ़ उस दिन दिल्ली गये हुए थे. बेटी की ख़बर मिलते ही वो वापस आ गए और उन्होंने इस मामले में अज्ञात व्यक्ति के ख़िलाफ़ थाना छावनी कानपुर महानगर में शिकायत दर्ज करायी है और अपनी बेटी की सुरक्षा की मांग की है.

वासिफ ने बताया कि उनकी बेटी उस दिन से डर व दहशत में है और स्कूल नहीं गयी है. परिवार वालों को आशंका है कि उसके साथ ये घटना दुबारा घट सकती है.

गौरतलब है कि कानपुर के रहने वाले सैय्यद वासिफ़ हैदर को 31 जुलाई 2001 को अगवा कर ‘आतंकवाद’ के आरोप में गिरफ़्तार बताया गया था, पूरे 8 साल जेल में रहने के बाद 12 अगस्त 2009 वासिफ़ हैदर को देश की अदालत ने बाइज्ज़त रिहा कर दिया था. रिहाई के बाद वासिफ़ इन दिनों अपने मुवाअज़े और ज़िम्मेदार पुलिस वालों पर क़ानूनी कार्रवाई को लेकर क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.

वासिफ़ हैदर की पुरी कहानी आप उन्हीं के ज़ुबानी नीचे पढ़ सकते हैं :

I am Syed Wasif Haider- A Terrorized Terrorist!

जिस ‘भारत माता’ के हाथ में भगवा, वो मेरी मां नहीं!

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Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net

शेरवानी और टोपी पहनकर स्पष्ट मुस्लिम पहचान रखने वाले सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने एक बयान दिया और भारत के सारे मुसलानों और देश के प्रति उनकी मुहब्बत को कठघरे में खड़ा कर दिया गया. बिना यह जाने-समझे कि इसका एक आम भारतीय मुसलमान पर असर क्या होगा? उसके बारे में देश के अन्य समुदाय के लोगों में राय क्या बनेगी? या कैसे उसकी सुरक्षा को ख़तरा पैदा हो सकता है और उसके संवैधानिक अधिकारों के हनन की संभावना पैदा हो सकती है?

सवाल यह भी है कि इस देश का मुसलमान किस ‘भारत माता की जय’ कहे? आख़िर पहले यह तो तय हो ‘भारत माता’ हैं कौन? क्या ‘भारत माता’ का जो स्वरूप देश के सामने आरएसएस पेश करती आ रही है, क्या वही असली ‘भारत माता’ हैं? क्या वही ‘भारत माता’ हैं, जिनके हाथों में तिरंगे की जगह भगवा झंडा है?

BHARAT Ammi

देश में साम्प्रदायिकता की सियासत करने वाले लोग दूसरों की देशभक्ति पर सवाल उठाने और अपनी ‘देशभक्ति’ दिखाने के लिए जिस ‘भारत माता’ का नारा लगवा रहे हैं, वो ‘भारत माता’ है ही नहीं.

देश की जनता को इनसे पूछना चाहिए कि आख़िर क्यों ‘भारत माता’ के हाथ से तिरंगा को छीन कर भगवा झंडा थमा दिया गया है? आख़िर क्यों ‘भारत माता’ का भगवाकरण किया जा रहा है? कहीं इसके पीछे कोई साज़िश तो नहीं? अगर ‘भारत माता’ जिसके हाथ में तिरंगे की जगह भगवा झंडा हो, जो सिर्फ़ हिन्दुत्व की बात करने वालों की मां हो, वो ‘भारत माता’ इस देश के सेकूलर लोगों को क़तई स्वीकार नहीं है. और न ही मुसलमानों को ‘भारत माता’ की जय के नारे लगाने के लिए हमारे मुल्क का संविधान बाध्य करता है.

ज़रा सोचिए! अगर देश के मुसलमान मिलकर अपनी ‘भारत अम्मी’ की छवि गढ़ लें. जिसके हाथों में तिरंगा हो. और वो इन तथाकथित देशभक्तों से कहने लगें कि आओ ‘भारत अम्मी’ की जय या ज़िन्दाबाद के नारे लगाओ तो क्या मोहन भागवत या पीएम नरेन्द्र मोदी इसे स्वीकार करेंगे? अगर आप मुसलमानों द्वारा गढ़े गए ‘भारत अम्मी’ के ज़िन्दाबाद के नारे नहीं लगा सकते तो फिर आपको अपनी ‘भारत माता’ की जय के नारे लगवाने का अधिकार किसने दे दिया?

हैरानी की बात यह है कि लोग इन सवालों पर सोचने के बजाए आरएसएस द्वारा गढ़ी गई ‘भारत माता’ को अपनी ‘भारत मां’ मान रहे हैं.

दरअसल, सच तो यह है कि ‘भारत माता’ के बहाने इस मुल्क के आपसी सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश में सिर्फ़ साम्प्रदायिक ताक़ते ही नहीं, बल्कि तथाकथित सेकूलरिज़्म के वो बड़े-बड़े चेहरे भी शामिल भी शामिल हो गए हैं, जो अपने बाहरी पहनावे में एकदम अलग-थलग दिखने की कोशिश करते हैं.

इसमें कोई शक नहीं है कि अससुद्दीन ओवैसी एक मुस्लिम चेहरा हैं. मुस्लिम पोशाक पहनते हैं. दीन-नमाज़ की बात करते हैं. इसलिए उनको निशाना बनाना मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाना है. ठीक इसी तरह से जब भी मुल्क में आतंकी की बात होती है, तो अफ़ज़ल गुरू का चेहरा पेश किया जाता है. लेकिन साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित या असीमानंद आदि का नाम नहीं लिया जाता है. क्यों यह सवाल नहीं उठता है कि भारत के कितने मुसलमान भ्रष्टाचार के आरोप में बंद हैं? माल्या की तरह कितने भारतीय मुसलमान देश का पैसा हड़प कर मुल्क से भागे हैं? क्या किसी भारतीय मुसलमान ने देश की सम्पत्ति के साथ करोड़ों का घोटाला किया? क्या कभी भारत के मुसलमानों ने हज़ारों-करोड़ों की सम्पत्ति को आग लगाया है? लेकिन हरियाणा के जाट हज़ारों-करोड़ की सम्पत्ति फूंकने के बाद भी ‘देशभक्त’ बने हुए हैं.

और सबसे महत्वपूर्ण सवाल कि भारत का मुसलमान अपनी देशभक्ति का सबूत क्यों दे? यह देश न तो गीता से चलता है, न कुरआन से चलता है और न ही इसे गुरू-ग्रंथ साहिब या बाईबिल चलाते हैं. हमारा यह देश संविधान से चलता है, वही संविधान जिसके रक्षा की क़सम हमारे देश के राष्ट्रपति खाते हैं.

इस देश का मुसलमान भारत को अपना ‘मादरे-वतन’ मानते हैं. यानी मुल्क को मां का तमाम दर्जा देता है. और इस्लाम में बताया गया है कि ‘मां के क़दमों के नीचे जन्नत है.’ ऐसे में इस्लाम को मानने वाला हर मुसलमान मुल्क की खिदमत उसी तरह से करता है, जिस तरीक़े से एक फ़रमा-बरदार बच्चा अपनी मां की करता है. अब इससे ज़्यादा और इससे बड़ी मुहब्बत की निशानी और क्या हो सकती है? लेकिन इसके बावजूद एक नारे की आड़ में एक विचारधारा को थोप कर मुल्क का माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है.

सवाल ये उठता है कि क्या मुल्क में कोई क़ानून बनाकर ज़ोर ज़बरदस्ती करके किसी को अपनी मां से प्यार करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता? शायद नहीं! लेकिन हां! इस्लाम अपने मानने वालों में यह भावना ज़रूर जगाता है कि अगर अपनी मां की खिदमत करेगा तो उसे जन्नत अता की जाएगी. यही भावना मुसलमानों को अपने मां या अपने ‘मादरे-वतन’ की ख़िदमत करने के लिए प्रेरित ज़रूर करती है.

ऐसे में यह कितना अजीब है कि ओवैसी ने ‘भारत माता की जय’ कहने से इंकार क्या किया. मुल्क के सियासतदानों का एक बड़ा तबक़ा तुरंत ही राजनीति के सारे हथियार इकट्ठा कर उन पर टूट पड़ा. कोई ओवैसी को कपूत बता रहा है तो कोई उनकी ज़ुबान काट कर लाने वाले को एक करोड़ का ईनाम देने की बात कर रहा है. तो किसी का कहना है कि ओवैसी की भारतीय नागरिकता छीन ली जाए...

ओवैसी के इस बयान के सियासी मायने ज़रूर हैं, क्योंकि ओवैसी बग़ैर फ़ायदे वाली बात पर टेंशन मोल लेने का काम नहीं करते. वो बहुत अच्छे से यह बात जानते हैं कि उनके इस तरह के बयान से उनका एक खास वोटर वर्ग खुश होता है. मगर इसे इस बार सियासी रंग देने में कोताही किसी ने भी नहीं की. महाराष्ट्र में जिस तरह से ओवैसी के पार्टी के एक विधायक को निलंबित करने में सभी पार्टियां एकजूट हो गई हैं, वो बताता है कि पॉलोराईज़ेशन का लेबल कितना गहरा और कितना व्यापक है.

यह बात भी सच है कि इस मुल्क में ओवैसी से पहले भी यह विवाद का विषय रहा है. संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान के तुरंत बाद ही इस पर कई हल्क़ों से तीख़ी प्रतिक्रियाएं आई थीं. जेएनयू छात्र-संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने भी अपने एक भाषण में एक बड़ा वाजिब सवाल किया था कि अगर आरएसएस के ‘भारत माता’ के कांसेप्ट में उसकी मां, करोड़ो दलितों-आदिवासियों की मां शामिल नहीं है, तो वे इस नारे को नहीं मानते.

यह बयान एक छात्र-संघ नेता का नहीं, बल्कि देश के उस तबक़े की सोच को दर्शाता है, जो देशभक्ति को दिल से महसूस करते हैं और जिसे किसी भी तरह के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं होती है.

इन सबके बीच ओवैसी के इस बयान की गुंज जारी है. जिस तरह से देश के कई प्रमुख राज्यों में चुनाव की तारीख़ नज़दीक आ रहे हैं, ऐसे में यह मुद्दा और भी भुनाया जाए तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए.

‘अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतों में कमी, पर भारत में बढ़े दाम’

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TwoCircles.net News Desk

पटना :केन्द्र सरकार के द्वारा पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में पुनः की गई वृद्धि का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने निन्दा की है. पार्टी ने इस बढ़ोत्तरी को महंगाई में वृद्धि करने वाला क़दम बताया है.

आज जारी एक प्रेस बयान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव सत्य नारायण सिंह ने कहा है कि –‘केन्द्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में क्रमशः 3.07 रूपये एवं 1.90 रूपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी उस समय की गयी है, जब अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों में लगातार कमी होती जा रही है.’

उन्होंने पीएम मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि –‘केन्द्र सरकार अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी को कारण बताकर पिछले दिनों लगतार इसकी कीमतों में वृद्धि करती रही, पर जब अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की कीमतों में अप्रत्याशित कमी आई है तब भी वह उसका लाभ उपभोक्ताओं और आम जनता तक नहीं पहुंचने दे रही है.’

श्री सिंह ने कहा है कि केन्द्र सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का दुष्प्रभाव उपभोक्ता वस्तुओं के दाम के साथ-साथ यात्री एवं ढुलाई भाड़े पर पड़ेगा, जिससे महंगाई और अधिक बढ़ जाएगी.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने केन्द्र से पेट्रोल और डीजल की इस मूल्य वृद्धि को वापस लेने की मांग की है और आम बिहार-वासियों का आह्वान किया है कि वे एकजुट होकर इस जन-विरोधी कार्रवाई का प्रतिरोध करें.

मुझे गर्व है 'जय हिन्द'कहने पर, लेकिन ‘भारत माता की जय’ पर मुझे एतराज़ है –ओवैसी

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TwoCircles.net News Desk

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (मजलिस) के सर्वे-सर्वा असदुद्दीन ओवैसी ने इन दिनों देश की राजनीत में भूकंप की स्थिति पैदा कर दी है. महाराष्ट्र के लातूर में भाषण के बाद उन्होंने आज फिर से बीबीसी के लिए लिखे अपने एक लेख में ‘भारत माता की जय’ कहने से इंकार किया है.

बीबीसी की वेबसाइट पर प्रकाशित अपने इस लेख में असदुद्दीन ओवैसी ने लिखा है –‘अगर देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) या कोई भी संगठन यह कहता कि हिंदुस्तान में किसी भी हिंदुस्तानी की वफ़ादारी और उसके हिंदुस्तान से मोहब्बत का पैमाना यह होगा कि उसे किसी ख़ास तरह के नारे लगाने पड़ेंगे तो मुझे इस पर सख़्त एतराज़ है.’

ओवैसी लिखते हैं –‘मेरा मानना यह है कि लोकतंत्र में हर किसी को अधिकार है नारे लगाने का, अपने मुल्क से मोहब्बत का इज़हार करने का, मगर किसी को यह अधिकार नहीं हैं कि वह यह कहे कि जो नारा मैं लगा रहा हूं, वही नारा सच्चा है और अगर आप वह नहीं लगाएंगे तो आप इस मुल्क से प्यार नहीं करते हैं. दूसरी बात यह है कि हमारे क़ानून में इस बात का ज़िक्र नहीं हैं न हमारे संविधान के मौलिक अधिकारों में इसका शुमार होता है जैसा कि आरएसएस कह रहा है.’

ओवैसी आगे लिखते हैं कि –‘मुझे गर्व है 'जय हिन्द'कहने पर, मुझे खुशी होती है जब हिंदुस्तान ज़िंदाबाद कहता हूं. अगर किसी और को दूसरा नारा लगाने पर खुशी मिलती है तो मुझे उसपर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मैं वह नारा नहीं लगाउंगा.’

ओवैसी के मुताबिक़ अगर कोई मेरे सामने खड़े होकर यह कहता कि उसे यह नारा लगाने से खुशी मिलती है तो मैं उन्हें कहूंगा कि आप वह नारा लगाएं, पर मैं नहीं लगाउंगा. यही तो हमारे देश की खूबसूरती है. यही हमारी विविधता है, यही हमारी बहुलतावादी संस्कृति की ख़ास पहचान है.

ओवैसी लिखते हैं कि –‘इसमें कुछ भी इस्लामिक मसला नहीं हैं और न ही मैं किसी इस्लामिक कानून को जानता हूं. यह तो आलिमों का मसला है. हिंदुस्तान के कानून में धार्मिक स्वतंत्रता एक बुनियादी हक़ है और इस हक़ को कोई नहीं छीन सकता. इसके साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है. हमारे देश के कानून के अनुसार मुझसे यह हक़ कोई नहीं छीन सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह हमारे संविधान का मौलिक हिस्सा है.’

महाराष्ट्र में अपने विधायक वारिस पठान के निलंबन को लेकर वो लिखते हैं कि –‘वारिस पठान को निलंबित करके आप क्या संदेश दे रहे हैं. कल को कोई कहेगा कि वारिस तुम्हारा मज़हब ठीक नहीं है तो अपना मज़हब बदल लो, कहां जा रहे हैं हम. अगर मैं किसी कानून को तोड़ता हूं तो मुझ पर केस दर्ज़ करें, सज़ा दिलाएं, जेल भेजें. मगर यह कहां से आ गया कि हमारे समूह या संगठन को यह चीज़ ख़राब दिख रही है और जो हम कहें वही कानून है. यह तो ठीक नहीं है. फिर तो कानून का शासन कहां रहेगा.’

ओवैसी लिखते हैं कि –‘हम अपनी मां से यकीनन प्यार करते हैं. जिस मां ने हमें पैदा किया उसके क़दमों के नीचे जन्नत है. लेकिन क्या हम अपनी मां की इबादत करते हैं? नहीं करते. हम अल्लाह की इबादत करते हैं.’

वो आगे लिखते हैं कि –‘हमें अपने देश से प्यार है और रहेगा. मैं इस देश का वफ़ादार हूं और रहूंगा. मगर यह किसी को अधिकार नहीं है कि वो मेरी वफ़ादारी पर शक़ करे. महज़ इस बुनियाद पर कि आपका जो नारा है वह हम नहीं लगाते. मुझे फ़ख़्र है कि मैं जय हिन्द कहता हूं. हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाता हूं. महाराष्ट्र विधानसभा में जो हुआ वह अच्छा नहीं हुआ. भाजपा के अलावा अन्य राजनीतिक दलों ने जो रुख अपनाया वह उनकी पोल खोलने के लिए काफी है.’

अपने लेख में ओवैसी राहुल गांधी पर भी निशाना साधते हुए लिखते हैं कि –‘कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जेएनयू गए थे और उन्होंने जो वहां भाषण दिया था, उसके आधार पर बात करें तो महाराष्ट्र के कांग्रेसी और तमाम धर्मनिरपेक्ष विधायकों का दोहरा चरित्र सामने आ जाता है. कांग्रेस उपाध्यक्ष जेएनयू में जाकर कहते हैं कि अपना पक्ष रखना एक बुनियादी हक़ है लेकिन महाराष्ट्र की विधानसभा जो हुआ वह क्या था. कांग्रेस उदारवादी तब तक ही है जब तक उन्हें राजनीतिक फायदा मिलता है. इसी तरह भाजपा भी तभी तक धर्मनिरपेक्ष बने रहना चाहती है जब तक उसके राजनीतिक हित सधते हैं. यह अव्वल दर्ज़े का दोहरा चरित्र है. कांग्रेस ने जेएनयू में जाकर जो किया वह एक नाटक के सिवाए कुछ नहीं था.’

वो आगे लिखते हैं कि –‘कुछ लोग मेरे बयान के समय पर सवाल उठा रहे हैं. उनका आरोप है कि इससे भाजपा को आने वाले पांच विधानसभा चुनावों में फायदा मिलेगा. मेरा इनसे सवाल क्या लोकसभा चुनावों में मेरे भाषणों के कारण भाजपा केंद्र में सत्ता में आई. क्या दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत और कांग्रेस की हार मेरी वज़ह से हुई. अपने गुनाहों का टोकरा मेरे सिर पर क्यों रखना चाहते हैं. इन पांच राज्यों में कहां चुनाव लड़ रहा हूं, कहीं नहीं फिर भी मुझ पर आरोप लगाए जा रहे हैं.’

आख़िर में ओवैसी लिखते हैं -‘मैं एक हिंदुस्तानी हूं और मैं अपनी बात कहूंगा. यह मेरा बुनियादी हक़ है और हम कब तक अपनी ज़बान को बंद रखेंगे. क्या यह लोग हमारे राजनीतिक आका है जो हम इनकी सुनें.’

‘पाई पाई जोड़कर आगे की पढ़ाई जारी रखूंगी’

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Saba Yaseen for TwoCircles.net

फ़ैज़ाबाद : 22 साल की आयशा की ख्वाहिश वकालत की पढ़ाई करके जज बनने की है, लेकिन देश में लॉ पढ़ाई करने वाले अन्य बच्चों की तरह आयशा की क़िस्मत नहीं है. इनके घर के हालात ऐसे हैं, जो आगे आयशा की पढ़ाई पर किसी भी तरह खर्च हो सके.

हालांकि काफी मुश्किल हालात में आयशा ने रुदौली डिग्री कॉलेज से 52 फीसद नबंरो के साथ बीए तक की डिग्री हासिल कर ली है. अब घर में आमदनी का कोई ज़रिया नहीं बचा, इसलिए आयशा की पढ़ाई यहीं ठहर गई है, लेकिन उनके हौसलों की उड़ान बाकी है.

अपने इरादे को मज़बूत किए घर का सारा काम करने के बावजूद वक़्त निकाल कर आयशा चार महीने से सिलाई सीख रही हैं, ताकि उनकी ठहरी हुई जिंदगी को बेहतर मुकाम मिल सके. मोहल्ले में चल रहा सिलाई कढ़ाई सेंटर उनके सपनो को पंख दे रहा है.

Ayesha

आयशा कहती हैं कि –‘ मैं सिलाई इसलिए सीख रही हूं ताकि सिलाई का काम करके कुछ पैसे कमा सकूं. और फिर पाई पाई जोड़कर आगे की पढ़ाई जारी रखूंगी.’

स्पष्ट रहे कि आयशा का घर फ़ैज़ाबाद मुख्यालय से क़रीब 40 किमी दूरी पर रुदौली कस्बा के घोसियाना मोहल्ला में है. एक छप्पर के घर में आयशा सपने दिन-रात पल रहे हैं.

मोहम्मद सलमान, आयशा के अब्बा हैं, जो पहले दर्जी का काम करके किसी तरह से परिवार की जिम्मेदारी अपने मज़बूत कंधो से खींच रहे थे. लेकिन अचानक तीन साल पहले फालिज़ की वजह से अब बिस्तर पर हैं, जहां वो मौत से हर दिन सामना कर रहे हैं.

लखनऊ के केजीएमयू अस्पताल में इलाज कराते-कराते तंगहाली ने इस परिवार को ऐसा जकड़ा है कि दो महीने से इलाज के पैसे नहीं हैं. आयशा की अम्मी अब दूसरों के घरों में जाकर घरेलू काम करती हैं और किसी तरह से अपने बच्चों व पति का पेट पाल रही है.

आयशा के चार भाई-बहन हैं. सबसे बड़ी बहन कनीज़ फ़ातिमा की शादी तीन साल पहले हो चुकी है. आयशा का 17 वर्षीय भाई अली मियां 8वीं क्लास तक पढ़ने के बाद सिलाई का पुश्तैनी हुनर सीख गया है. आसमा बानो 15 साल की सबसे छोटी हैं, जो आठवीं तक ही पढ़ पाई है, 9वीं क्लास के लिए फीस का इंतजाम नहीं हो पाने पर अब घर पर ही रहती हैं.

ऐसे हालात में आयशा के लिए लॉ की पढ़ाई करना काफी मुश्किल महसूस होता है, लेकि आयशा के इरादे काफी बुलंद हैं. वो दिन-रात मेहनत करके अपने सपने को साकार करने की कोशिश में लगी हुई हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि आयशा की मेहनत एक न एक दिन ज़रुर रंग लायेगी.

सबा यासीन रुदौली में रहते हुए सामाजिक सरोकारी कार्यो से जुड़ी हैं. फिलहाल ‘मिसाल नेटवर्क’ से जुड़ी हुई हैं. उनसे ई-मेल sabarudauli200@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.

निजीकरण के दौर में सरकारी स्कूल

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Javed Anis for TwoCircles.net

सरकारी स्कूल हमारे देश के सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद हैं. ये देश के सबसे वंचित व हाशिये पर पहुंचा दिए गये समुदायों की शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था के निजीकरण और इसे मुनाफ़ा आधारित बना डालने का मंसूबा पाले लोगों के रास्ते में भी यही सरकारी स्कूल सबसे बड़ी रूकावट हैं. लेकिन तमाम हमलों और विफल बना दिए जाने की साजिशों के बीच इनका वजूद क़ायम है और आज भी जो लोग सामान शिक्षा व्यवस्था का सपना पाले हुए हैं, उनके लिए यह उम्मीद बनाए रखने का काम कर रहे हैं.

90 के दशक में उदारीकरण आने के बाद से सावर्जनिक सेवाओं पर बहुत ही सुनोयोजित तरीक़े से हमले हो रहे हैं और उन्हें नाकारा व अनुउपयोगी साबित करने हर कोशिश की जा रही है. एक तरह से सावर्जनिक सेवाओं का उपयोग करने वालों को पिछड़ा और सब्सिडी-धारी गरीब के तौर पर पेश किया जा रहा है. उच्च मध्यवर्ग और यहां तक कि मध्यवर्ग भी अब सावर्जनिक सेवाओं के इस्तेमाल में बेइज्ज़ती सा महसूस करने लगे हैं. उनको लगता है इससे उनका क्लास स्टेटस कम हो जाएगा. इसकी वजह से सरकारी सेवाओं पर भरोसा लगातार कम हो रहा है.

क़ायदे से तो इसे लेकर सरकार को चिंतित होना चाहिए था, लेकिन सरकारी तंत्र, राजनेता और नौकरशाही इन सबसे खुश नज़र आ रहे हैं, चूंकि निवेश और निजीकरण सरकारों के एजेंडे में सबसे ऊपर आ चुका है. इसलिए सामाजिक सेवाओं में सरकारी निवेश को सब्सिडी कहकर मुफ्तखोरी के ताने माने जा रहे हैं और इन्हें कम या बंद करने का कोई भी मौक़ा हाथ से जाने नहीं दिया जा रहा है.

हमारे सरकारी स्कूलों में भी धीरे-धीरे नेताओं, नौकरशाहों, बिजनेस और नौकरी-पेशा लोगों के बच्चों का जाना लगभग बंद हो चुका है. अब जो लोग महंगी और निजी स्कूलों की सेवाओं को अफोर्ड नहीं कर सकते हैं, उनके लिए सस्ते प्राइवेट स्कूल भी उपलब्ध हैं. इनमें से कई तो सरकारी स्कूलों के सामने किसी भी तरह से नहीं टिकते हैं. लेकिन फिर भी लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की जगह कमतर लेकिन निजी स्कूलों में भेजना ज्यादा पसंद करते हैं. और तो और अब स्वयं सरकारी स्कूल के अध्यापक भी अपने बच्चों को प्राईवेट स्कूलों में भेजने को तरजीह देने लगे हैं.

यह स्थिति हमारी सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था की त्रासदी बयान करती है. आज हमारे स्कूल भी हमारे आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के नए प्रतीक बन गये हैं. सत्ताधारियों की मदद से शिक्षा को एक व्यवसाय के रूप में पनपने के सबूत भी हैं. यह बहुत आम जानकारी हो चुकी है कि किस तरह से नेताओं, अफ़सरों और व्यपारियों की गठजोड़ ने सावर्जनिक शिक्षा को दीमक की तरह धीरे-धीरे को चौपट किया है, ताकि यह दम तोड़ दें और उनकी जगह पर प्राइवेट क्षेत्र को मौक़ा मिल सके.

इसलिए जब कुछ अपवाद सामने आते हैं, तो वे राष्ट्रीय ख़बर बन जाते हैं. 2011 में इसी तरह की एक ख़बर तमिलनाडू से आई थी. जहां इरोड ज़िले के कलेक्टर डॉ. आर. आनंद कुमार ने जब अपनी 6 साल की बेटी का नाम एक सरकारी स्कूल में दर्ज कराया तो यह घटना एक राष्ट्रीय ख़बर बन गई. स्कूल स्तर पर भी इसका असर देखने तो मिला था. कलेक्टर की बच्ची के सरकारी स्कूल में जाते ही सरकारी अमले ने उस स्कूल की सुध लेनी शुरु कर दी और उसकी दशा पहले से बेहतर हो गयी.

ज़ाहिर है अगर यह अपवाद आम बन जाये तो बड़े बदलाव देखने को मिल सकता है. शायद इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सितम्बर 2014 में केंद्र सरकार से कहा था जिस तरह से सरकारी मेडिकल कॉलेज सबसे अच्छे माने जाते हैं, उसी तरह से सरकार देशभर में अच्छे स्कूल क्यों नहीं खोलती है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी पिछले साल अगस्त में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए यूपी सरकार से कहा था कि –‘जन-प्रतिनिधियों व सरकारी ख़ज़ाने से वेतन या मानदेय पाने वाले हर व्यक्ति के बच्चे का सरकारी स्कूल में पढ़ना अनिवार्य किया जाए और इसकी अवहेलना करने वालों पर कड़ी कार्यवाही हो.’

इस फैसले का आम जनता द्वारा तो खूब स्वागत किया गया, लेकिन संपन्न वर्ग की प्रतिक्रिया थी कि पालकों को यह आज़ादी होनी चाहिए कि उन्हें अपने बच्चों को कहां पढ़ाना है. हाईकोर्ट के इस आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश के मंत्री और नौकरशाह इस पर अमल के लिए तैयार नहीं हुए.

पिछले दिनों जो ख़बरें आई हैं, उसके अनुसार यूपी सरकार हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल करने की तैयारी में है.

यह एक ऐसा दौर है, जब तमाम ताक़तवर और रुतबे वाले लोग ‘सरकारी स्कूलों के निजीकरण’ के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं. इसके लिए खुले तौर लाबिंग की जा रही है. यह लोग सरकारी स्कूलों को ऐसा सफ़ेद हाथी बता रहे हैं जो अब भ्रष्ट, निष्क्रिय और बोझ बन चुका है.

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी नाम की कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी नुमा एक सामाजिक संस्था है, जिसका मानना है कि सरकारी स्कूल भारत के बच्चों की ज़रूरतों पर खरे नहीं उतर रहे है. इसीलिए यह निजी स्कूलों की वकालत करती है.

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा “स्कूल चयन अभियान” नाम से एक परियोजना चलाई जा रही है, जिसके तहत स्कूलों की जगह छात्रों को फंड देने की वकालत जा रही है, जिसे वे “स्कूल वाउचर” का नाम दे रहे हैं. उनका तर्क है कि इस वाउचर के सहारे ग़रीब और वंचित परिवारों के बच्चे भी अपने चुने हुए स्कूलों में पढ़ सकेंगे.

ज़ाहिर सी बात है इससे उनका मतलब निजी स्कूलों से है. सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की एक प्रमुख मांग यह भी है कि आरटीई कानून को लेकर उस गुजरात मॉडल को अपनाया जाए, जहां निजी स्कूलों की मान्यता के लिए ज़मीन व अन्य आवश्यक संसाधनों में छूट मिली हुई है और लर्निग आउटपुट के आधार पर मान्यता का निर्धारण होता है.

इस साल फ़रवरी में निजी स्कूलों के संगठन नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स एलांयस (नीसा) द्वारा इसी मांग को लेकर दिल्ले के जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन भी किया गया है, जिसमें प्रधानमंत्री से स्कूलों की मान्यता के मामले में गुजरात मॉडल को देशभर मे लागू करने की मांग की गयी थी.

दरअसल यह ढील इसलिए मांगी जा रही है, क्योंकि लाखों की संख्या में प्राइवेट स्कूल शिक्षा अधिकार कानून के मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं. इसलिए उन पर बंद होने का ख़तरा मंडरा रहा है.

हमारी शिक्षा व्यवस्था सफ़ेद नहीं बीमार हाथी की तरह है, जिसे गंभीर इलाज की ज़रूरत है. लेकिन समस्या यह है कि हर कोई इसका अपने तरह से इलाज करना चाहता है. यहां सूंड और पूंछ की कहानी सच साबित हो रही है और कुछ लोग इस भ्रम को और बढ़ाकर शिक्षा को अपनी दूकानों में सजाना चाहते हैं.

सरकारी स्कूल अगर बीमार हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कोई और नहीं हमारी सरकारें हैं. शिक्षा को स्कूलों के एजेंडे से गायब कर दिया गया है और इसकी जगह पर शौचालय, एमडीएम एवं सतत् व व्यापक मूल्यांकन प्रणाली (सीसीई) को प्राथमिकता मिल गयी है. सारा ज़ोर आंकड़े दुरुस्त करने पर है. स्कूल एक तरह से ‘डाटा कलेक्शन एजेंसी’ बना दिए गये हैं.

कागज़ी काम बहुत हो गया है और शिक्षकों का काफी समय आंकड़े जुटाने व रजिस्टरों को भरने में ही चला जाता है. हर काम के लिए लक्ष्य और निश्चित समयावधि निर्धारित कर दी गयी है. हमारे शिक्षकों का सारा ध्यान इसी लक्ष्य को पूरा करने की जोड़-तोड़ लगा रहता है.

हमारे स्कूल ऐसे प्रयोगशाला बना दिए गये हैं, जहां हर कोई विचारों और नवाचारों को आज़माना चाहता है. देश के लगभग 20 फीसदी स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं. समुदाय के लोगों की ज्यादा रुचि स्कूल में होने वाली शिक्षा की जगह वहां हो रहे आर्थिक कामों में अपना हिस्सा मांगने में दिखाई पड़ने लगी है. शिक्षकों के लिए किसी भी तरह के प्रोत्साहन की वयवस्था नहीं है. उलटे सारी नाकामियों का ठीकरा उन्हीं के सर पर फोड़ दिया जाता है.

इन तमाम समस्याओं से जूझते हुए भी हमारी सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था अपने आप को बनाये और बचाए हुए है. बल्कि यूं कहें कि दौड़ नहीं तो कम से कम चल रही है.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार देश भर में क़रीब दो लाख सरकारी स्कूल हैं, जहां 13.8 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं. जबकि प्राइवेट स्कूलों में क़रीब 9.2 करोड़ छात्र पढ़ते हैं. यानी अभी भी सरकारी स्कूल ही है, जो तमाम कमजोरियों के बावजूद हमारी शिक्षा व्यवस्था को अपने कंधे पर उठाये हुए हैं.

आज भी सबसे ज्यादा बच्चे अपनी शिक्षा के लिए इन्हीं सरकारी पर निर्भर हैं, जिनमें ज्यादातर गरीब और हाशिये पर पंहुचा दिए गये समुदायों से हैं. इसलिए ज़रूरी है कि इन्हें मज़बूत बनाया जाए. लेकिन यह काम सभी की सहभागिता और सहयोग के बिना नहीं हो सकता है. इस दिशा में राज्य, समाज, शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन समिति आदि को मिलकर अपना योगदान देना होगा. कोठारी कमीशन द्वारा 60 के दशक में ही समान शिक्षा प्रणाली की वकालत की गयी थी. मज़बूत सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था हमें उस सपने के और क़रीब ला सकती है.

जावेद अनीस स्वतंत्र पत्रकार हैं और भोपाल में उनकी रिहाईश है. उनसे javed4media@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.

यदि आप उर्दू में लिखते हैं तो देशप्रेमी होने का सबूत दीजिए

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TwoCircles.net Staff Reporter

दिल्ली – उर्दू के प्रचार-प्रसार के लिए गठित संस्था ‘राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद्’ यानी National Council for Promotion of Urdu Language (NCPUL) से जुड़ा हुआ एक ताज़ा विवाद सामने आ रहा है. यह विवाद उस बांड को लेकर है, जिसके तहत उर्दू भाषा में लिखने वाले लेखकों और संपादकों को कमोबेश अपनी देशभक्ति और सरकार से सहमति का सुबूत देना होगा.

राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद् ने जिन उर्दू लेखकों और संपादकों की किताबों के वितरण की जिम्मेदारी ली, परिषद् उन सभी लेखकों से उस बांड पर दस्तखत करवा रही है, जिसमें यह लिखा है कि लेखकों की कोई भी किताब देश या सरकार के खिलाफ नहीं होगी.



आज ही सुर्ख़ियों में आया यह मामला कई महीनों से चल रहा था, जहां लेखकों से इस विवादास्पद बांड पर दस्तखत करवाए जा रहे थे.

इसके साथ-साथ इस फॉर्म में दो गवाहों के भी दस्तखत की मांग की गयी है. अंग्रेज़ी अखबार The Indian Express के मुताबिक़, यह फॉर्म उन लेखकों और संपादकों को दिए जा रहे हैं, वितरण के लिए जिनकी किताबें भारी मात्रा में खरीदी जाएंगी. फॉर्म के मुताबिक़, लेखक को इस बात पर हामी भरनी है उनकी यह किताब सरकार और देश के खिलाफ नहीं है और न ही सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से जुडी हुई है.

परिषद् के निदेशक इर्तेज़ा करीम ने The Indian Express से बातचीत करते हुए बताया, ‘हाँ, यदि लेखक को सरकार से वित्तीय मदद मिल रही है तो उसकी किताब को किसी भी हाल में सरकार के खिलाफ नहीं होना चाहिए. राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद् एक सरकारी संस्था है और हम सब सरकारी मुलाजिम हैं. हम प्राकृतिक रूप से राजकीय मूल्यों की रक्षा करेंगे.’

देश के कई उर्दू लेखकों में सरकार के इस फॉर्म के प्रति गहरी नाराज़गी है. कईयों में इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में अपनी नाराजगी ज़ाहिर की है.
वर्तमान में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी NCPUL की चेयरपर्सन हैं और उनके साथ-साथ राष्ट्रीय बुक ट्रस्ट, साहित्य अकादमी और दूरदर्शन के चेयरमैन समेत लगभग 40 लोग परिषद् की कार्यकारिणी में शामिल हैं.

आतंकवाद के आरोपों से बरी हुए लोगों व उनके परिजनों की सुरक्षा की गारंटी करे सरकार

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TwoCircles.net News Desk

लखनऊ :रिहाई मंच ने आतंकवाद के आरोप से बरी हुए कानपुर के वासिफ़ हैदर की बेटी के अपहरण की कोशिश को गम्भीर आपराधिक मामला बताते हुए दोषियों को पकड़ने की मांग की है.

मंच के प्रवक्ता शाहनवाज़ आलम ने बताया कि वासिफ़ हैदर की 12 वर्षीय बेटी मनाल को स्कूल के सामने से उठाने की कोशिश करने में नाकाम लोगों ने धमकी दी कि पिता से कह दो की मुक़दमा न लड़े. इस घटना के बाद से वह दो दिनों तक लगातार बेहोश रहीं और आज भी वह इतना डरी हुई हैं कि घंटों के लिए बेहोश हो जा रही हैं. इस घटना के वक्त वासिफ़ हैदर मुक़दमे के सिलसिले में दिल्ली गए हुए थे और सूचना मिलते ही वापस लौट आए थे.

रिहाई मंच के प्रवक्ता ने बताया कि वासिफ़ हैदर बरी होने के बाद से ही एक हिंदी दैनिक के खिलाफ़ मानहानि का मुक़दमा लड़ रहे हैं, जिसके खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट ने भी उक्त अख़बार को नोटिस भेजा है.

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के महासचिव राजीव यादव ने कहा है कि सपा सरकार ने वादा किया था कि वह आतंकवाद के आरोपों से बरी लोगों के पुर्नवास और दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ़ कार्रवाई करेगी जो उसने नहीं किया. पर जो बेगुनाह दोषी पुलिस व मीडिया के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई कर रहे हैं उनको व उनके परिजनों पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं, वो साबित करता है कि सरकार के दोषियों के खिलाफ़ कार्रवाई न करने से दोषियों का मनोबल बढ़ गया है.

उन्होंने कहा कि ऐसे ही आर.डी. निमेष कमीशन पर रिपोर्ट को सरकार द्वारा छिपाने और दोषियों को बचाने के चलते आपराधिक पुलिस व आईबी के अधिकारियों का मनोबल बढ़ गया था, जिन्होंने मौलाना खालिद की हत्या करवा दी थी.

मंच ने मांग किया कि आतंकवाद के आरोपों से बरी युवकों और उनके परिजनों की सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चत करते हुए उनके पुर्नवास और फंसाने वाले पुलिस व खुफिया अधिकारियों के खिलाफ़ कार्रवाई सुनिश्चित करे.

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मोदी जी! सिर्फ़ विदेशी निवेश से देश का विकास नहीं होगा

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TwoCircles.net News Desk

पटना :भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव सत्य नारायण सिंह ने केन्द्र सरकार द्वारा लघु बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज दर में की गई कटौती का विरोध किया है.

सत्य नारायण सिंह ने आज अपने एक बयान में कहा है कि –‘लघु बचत योजनाओं से समाज के निम्न मध्यवर्ग तथा गरीबों को कुछ लाभ मिलता था. इन योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज के लोभ में ही समाज का कमजोर वर्ग भी अपने दैनिक खर्चों में कटौती करके लघु बचत योजनाओं में अपनी कमाई का एक हिस्सा निवेश करता है.’

स्पष्ट रहे कि केन्द्र सरकार ने पीपीएफ़ और किसान विकास पत्र सहित लघु बचत योजनाओं पर ब्याज दर में भारी कटौती कर दी है. पीपीएफ पर मिलने वाले ब्याज दर 8.7 प्रतिशत से घटाकर 8.1 प्रतिशत किसान विकास पत्र पर 8.7 प्रतिशत से घटाकर 7.8 प्रतिशत, सुकन्या समृद्धि खाता पर 9.2 प्रतिशत से घटाकर 8.6 प्रतिशत, नागरिक बचत योजना पर 9.3 प्रतिशत से घटाकर 8.6 प्रतिशत कर दिया है.

लघु बचत योजना पर मिलने वाले ब्याज की दर में कटौती के पक्ष में सरकार की दलील है कि इन योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज की दरों को बाजार की दर के समकक्ष लाना है.

लेकन सत्य नारायण सिंह कहते हैं कि –‘केन्द्र सरकार यह भूल जाती है कि बड़ी बचत योजनाओं में निवेशक अपना पेट काटकर निवेश नहीं करते हैं. निवेश का उनका लक्ष्य होता है ज्यादा से ज्यादा धन कमाना, जबकि लघु बचत योजनाओं के निवेशक अपनी ज़रूरतों के खर्चों में कटौती करके निवेश करते हैं कि मुसीबत की घड़ी में उनकी बचत राशि काम आयेगी.’

वो बताते हैं कि –‘किसी देश के आर्थिक विकास में बचत और निवेश एक महत्वपूर्ण कारक होते हैं. बचत के बिना निवेश संभव नहीं है. केवल विदेशी निवेश से देश का विकास नहीं होगा.’

सत्य नारायण सिंह का कहना है कि –‘लघु बचत योजनाओं के ब्याज की दरों में कटौती करके केन्द्र सरकार ने छोटे निवेशकों को भारी झटका दिया है. सरकार के इस जनविरोधी क़दम से छोटे निवेशक हतोत्साहित होंगे और बचत में कमी आयेगी.’

दंगे ने हमसे हमारा सब कुछ छीन लिया

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Mahmood for TwoCircles.net

दंगे का ज़ख़्म कैसे नासूर बन जाता है इसे बिहार के भागलपुर दंगा पीड़ितों से बेहतर कौन समझेगा.

24 अक्टूबर 1989... इतिहास के पन्नों में दर्ज वह दिन है जब भागलपुर सांप्रादायिक दंगों की आग में भभक उठा. हज़ारों की तादाद में आबाद बस्ती बर्बाद होने लगी. 15 जनवरी 1990 तक दंगों का यह हैवानी खेल बदस्तूर जारी रहा.

सैकड़ों बेगुनाह दीन और दुनिया दोनों से अलविदा हो गए. जो बचे अब उनके इम्तेहान की बारी थी. दंगों की मार खाए कई परिवार दर-बदर हो गए. कुछ ऐसे भी थे जिन्हें न भागने की जगह मिली न छिपने का ठौर. देखते-देखते वो दिन भी आ गया जब इस खूनी खेल से आजिज़ आकर लोगों को मजबूरी में अपना घर-बार भी छोड़ना पड़ा.

जो दंगे की इस आग से बच निकले वो आज भी मंज़र भूलते नहीं. दंगों के दौरान विस्थापित हो गए परिवारो में से दर्द में लिपटी एक परिवार की ऐसी ही कहानी जो आपके रोंगटे खड़े कर देगी...

एक आबाद, खुशहाल और रेशम के काम में डूबा हुआ मख़मली शहर यह नहीं जानता था कि एक दिन उसे भी हिंदू-मुस्लिम दंगे की आग में सुलगना होगा. इस क़दर लोग मजबूर होंगे कि बरसो की मेहनत से बने घर को भी हमेशा के लिए छोड़ देना होगा. जिस आंगन में बचपन बीता वह भी पराया हो जाएगा.

Fareed

भागलपुर के सलामपुर में पले-बढ़े क़रीब 44 वर्षीय फ़रीद दंगे के भुक्तभोगी रहे हैं. दंगे के दौरान फ़रीद की उम्र महज़ 19 साल थी. पूरे परिवार का जिम्मा उन्हीं के कंधों पर था. दंगे के दौरान फ़रीद और उनकी पत्नी फ़ातिमा व बच्चों सहित पूरा परिवार डर के साए में एक-एक पल गुज़ार रहे थे. दंगे से उठी आग की लपट उनके घर को भी झुलसा रही थी. मजबूरन फ़रीद और उनके परिवार को विस्थापित होने का फैसला करना पड़ा.

यह आलम सिर्फ फ़रीद के लिए नहीं था, हर कोई गांव छोड़ देना चाहता था क्योंकि जिंदगी बचाने के लिए इसके अलावा दूसरा और कोई रास्ता ही न था.

दंगा पीड़ित फ़रीद कहते हैं कि –‘अपना घर भला कौन छोड़ना चाहता है, अगर हम वहां से न निकले होते तो ज़रूर इस दुनिया से रुख्सत हो जाते.’

फ़रीद की आंखों में आंसू छलक आए हैं... वो घड़ी बहुत मुश्किल थी जब हमने घर छोड़ने का फैसला किया. साहब हम क्या करते... ऐसी घड़ी थी कि दंगाई एक दूसरे का खून पीने को अमादा थे. हम लोग गरीब-गुरबा हैं. रोज़ कुआं खोदते हैं और रोज पानी पीते हैं. नन्हें बच्चों की फिक्र मुझे खाए जा रही थी.

फ़रीद सवाल करते हैं कि आखिर हमारा कसूर क्या था... फ़रीद का गला रूंध गया और बोले कि दंगे ने हमसे हमारा सब कुछ छीन लिया... अल्लाह...

लिखा-पढ़ी के लिए जिन हर्फों की ज़रूरत पड़ती है फ़रीद और उनका परिवार इससे महरूम है. फ़रीद फैसला तो कर चुके थे कि परिवार बचाना है तो घर छोड़ना होगा, लेकिन इससे भी मुश्किल सवाल उनके सामने खड़ा था कि जाएं तो जाएं कहां...

डूबते को तिनके का सहारा मिला. फ़रीद बांका ज़िले के हसनपुर गांव में पहुंच गए. यह गांव अमरपुर ब्लॉक में मौजूद है. पहले यह हलका भागलपुर के ही दायरे में था. अब यह गांव ज़िला बांका के दायरे में है.

दंगे के दौरान विस्थापित होकर यहां बसने वालों में फ़रीद और उनका परिवार अकेला नहीं था. क़रीब 32 गांवों से दंगा पीड़ित अपनी जिंदगी और दर्द का मंज़र साथ लेकर इस गांव में ठौर की तलाश में पहुंचे थे.

बंजर पड़ी ज़मीनों पर फ़रीद और दूसरे दंगा पीड़ितों ने अस्थाई डेरा जमाया. जब दंगे की आग शांत हुई तो दंगा पीड़ित फ़रीद सरीखों ने सलामपुर में अपने वालिदैन की खून-पसीने से बनाई गई ज़मीनों और घरों को औने-पौने दामों पर बेच दिया.

कम्बख्त जिंदगी रूकती नहीं... हसनपुर में अस्थाई डेरे को स्थाई बनाना था तो फ़रीद और उन जैसे दंगा पीड़ितों ने मुंह मांगी कीमतों पर एक से डेढ़ कट्ठा ज़मीनें खरीदीं. डेरा स्थाई हुआ लेकिन घर का ढांचा बनाने में भी पैसा लगता है, वह कहां से आता?

यह दौर 1995 का था. सियासत भी गर्म थी और फिज़ा में वादे ही वादे थे. निज़ाम और हुक्काम से मदद की आस में दंगा पीड़तों की उम्र गुज़रती रही, कैलेंडर बदलते रहे. और अब भी कहने को यही है कि अब तक कुछ न हुआ...

यह 2016 है. नए निज़ाम हैं. हिंदुस्तान की नई ईबारत लिखी जा रही है... सब कुछ नया-नया है. फ़रीद और उनके ज़ख्म 25 साल से भी ज्यादा पुराने हैं... बिना छत वाले घर में, खुले आसमां में फ़रीद और नौ बच्चों के साथ उनका परिवार डेढ़ कट्ठे की ज़मीन पर अपने दर्द को बयां करने के लिए तस्वीर खिंचवा रहे हैं.

पूछने पर फ़रीद कहते हैं कि देश के अर्थ-व्यवस्था में भले ही निखार हो. आप खुद हमारी माली हालत देख लें. साल की शुरुआत में ही 1 जनवरी, 2016 को सुबह आठ बजे मेरी पत्नी फ़ातिमा हादसे का शिकार हो गई.

इतने में फ़ातिमा कहती हैं कि हमारे इस घर के ऊपर से ये जो हाईटेंशन का तार है, यह टूट कर गिर गया था. इससे घर में आग लग गई और मैं बुरी तरह से झुलस गई...

फ़रीद टोकते हुए कहते हैं कि बताइए साहब! हमने इस बिजली का सुख कभी नहीं जाना, भले ही यह दूसरे का घर रोशन कर रही हो, लेकिन इसने हमारा घर तो जला दिया...

इस दंगे को लेकर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस घटना में 1123 लोगों का क़त्ल-ए-आम हुआ था. परंतु गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ कम-से-कम दो हज़ार लोगों का खून, पानी की तरह सड़कों पर बहा था.

हत्याओं, दंगा भड़काने और उसके बाद राज्यतंत्र की भूमिका पर कई गहरे सवाल उठाए जाते हैं, लेकिन इन सवालों का जवाब सरकार कभी आम जनता को नहीं देना चाहती है.

भागलपुर और उससे टूटकर बने नए ज़िलों के सैकड़ों भुक्तभोगी न्यायालय से आने वाले हर नए फैसले की ओर इस उम्मीद से निगाहें लगाए रहते हैं कि उन्हें देर-सबेर इंसाफ़ ज़रूर मिलेगा.

लेखक महमूद भागलपुर में जन्मे हैं. तिलकामाझी विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद हाशिए के समाज को अधिकार दिलाने में जी जान से जुटे हैं और इस समय वो ‘मिसाल नेटवर्क’ का हिस्सा हैं. उनसे 8757947756 पर सम्पर्क किया जा सकता है.

‘हमारी धरोहर’ से जगी अल्पसंख्यकों में उम्मीद!

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Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net

भारत और विश्व में पारसियों एवं ज़ोरोएस्ट्रियनिज़्म के योगदान का यशोगान के तहत ‘दि एवरलास्टिंग फ्लेम अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम’ शनिवार को आरंभ हो चुका है.

19 मार्च से लेकर 27 मार्च, 2016 तक चलने वाले इस ‘द एवरलास्टिंग फ्लेम इंटरनेशनल कार्यक्रम’ में तीन प्रकार की प्रदर्शनियों का आयोजन किया गया है, जो विश्व भर में फैली पारसी संस्कृति की शुरूआत और भारत, ब्रिटेन, ईरान, रूस, उज्बेकिस्तान और अन्य प्राइवेट डोनर्स से ऐतिहासिक, कलात्मक तथा सभ्यता संबंधी वस्तुओं के माध्यम से समुदायों के बीच परंपराओं की निरंतरता का बयान करेंगी.

यह कार्यक्रम अल्पसंख्यक मंत्रालय की ‘हमारी धरोहर’ स्कीम के अंतर्गत संस्कृति मंत्रालय और परजोर फाउंडेशन के साथ मिलकर आयोजित किया गया है.

बताते चलें कि मुल्क में तमाम अल्पसंख्यकों की समृद्ध संस्कृति और विरासत को बचाने के मक़सद के तहत मोदी सरकार ने ‘हमारी धरोहर’ स्कीम की शुरूआत साल 2014-15 में की. यानी यह स्कीम अल्पसंख्यक पहचान की सलामती मुक़र्रर करने के ख़ातिर चलाई जा रही है. इस योजना का उद्देश्य पुराने दस्तावेज़ों, खत्ताती, अनुसंधान और विकास को समर्थन देना भी है. फिलहाल इस स्कीम के तहत सबसे पहली प्राथमिकता पारसी समुदाय को दी गई है.

‘हमारी धरोहर’ स्कीम को लेकर सरकार कई बड़े दावे हैं. अल्पसंख्यक मंत्रालय के मुताबिक़ ‘द एवरलास्टिंग फ्लेम इंटरनेशनल कार्यक्रम’ के अलावा उसने दायरतुल मारिफुल उस्मानिया, उस्मानिया विश्वविद्यालय तेलंगाना के संबंध में एक परियोजना को मंजूरी दी है, जिसके तहत दस्तावेज़ों का अरबी से अंग्रेजी में अनुवाद किया जाएगा. इसमें औषधि, गणित, साहित्य आदि से संबंधित मुग़लकाल के 240 मूल्यवान दस्तावेज़ों को दोबारा प्रकाशित करना और उनका डिजीटलीकरण शामिल है. लेकिन हक़ीक़त यह है कि यह प्रोजेक्ट फिलहाल सिर्फ़ कागज़ों पर है.

अल्पसंख्यक मंत्रालय से हासिल दस्तावेज़ बताते हैं इस ‘हमारी धरोहर’ स्कीम के तहत साल 2014-15 में 5 करोड़ का बजट आवंटित किया गया और 5 करोड़ में से 4.99 करोड़ रूपये खर्च कर दिया गया.

साल 2015-16 में इस स्कीम का बजट दोगुना करके 10.01 करोड़ कर दिया गया,लेकिन जून 2015 तक मौजूद दस्तावेज़ बताते हैं कि इस स्कीम के तहत एक पैसा भी खर्च नहीं किया गया है, ये अलग बात है कि शायद ये सारे फंड 19 मार्च से लेकर 27 मार्च, 2016 तक चलने वाले इस ‘द एवरलास्टिंग फ्लेम इंटरनेशनल कार्यक्रम’ में ज़रूर खर्च हो जाएंगे.

आने वाले नए वित्तीय साल में भी सरकार इस योजना को लेकर काफी सजग नज़र आ रही है. इस स्कीम के लिए साल 2016-17 में 11 करोड़ का बजट आवंटित किया गया है.

बहरहाल, सरकार द्वारा पारसी समुदाय से जुड़ी धरोहरों को संरक्षित करने की पहल सराहना के क़ाबिल है. इससे अल्पसंख्यक तबक़े में न सिर्फ़ भरोसा बढ़ेगा, बल्कि उनकी सहेजी गई धरोहरें आने वाली पीढ़ी को रास्ता भी दिखाएगी. लेकिन यह भी ज़रूरी है कि सरकार ऐसी ही पहल सभी अल्पसंख्यक तबक़ों के लिए करे ताकि ‘सबका साथ –सबका विकास’ के दावे को सही अर्थों में ज़मीन पर उतारा जा सके.

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व्योमेश शुक्ल

[आज की बहस का सबसे बड़ा सच यही है कि मुसलमान को बारम्बार यह साबित करना होता है कि वह इस वतनपरस्त है. आज भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की बरसी है. उन्हें और लता मंगेशकर को एक साथ भारत रत्न दिया गया था. आज से तकरीबन दस साल पहले. अब यह बदहाली का ही आलम है कि मदन मोहन मालवीय को पिछले साल भारत रत्न दिए जाने के बाद उस्ताद के शहर बनारस में ही यह हल्ला होने लगा कि बनारस को मिला यह पहला भारत रत्न है. उस्ताद अब अपने शहर में ही अनजान हैं. वे मुस्लिम समुदाय में भी मुहर्रम हैं. साल में एक दफ़ा ही याद आते हैं. इस थोड़े लम्बे आलेख के लिए पाठकों का धैर्य ज़रूरी है. उस्ताद के जीवन से सीखने में भलाई है.]

उस्ताद ने अपना बाजा शहर में खो दिया था। किसी शहर में खो जाने की पर्याप्त वजहें होती हैं। अनेक तरीक़ों से गुम होकर उतने ही नवीन नतीजों में पाया जाना होता है। यह सिर्फ़ खेल नहीं है, संस्थापन की विपदाएँ हैं। एक ही जगह रहने का मूल्य। बड़ी बहसों और साहित्य वग़ैरह में विस्थापन के विभिन्न आयामों पर ख़ूब बात हुई और संस्थापन को, आदिवास को कम मान लिया गया। संस्थापन जबकि विस्थापन का आधार है या उसका प्रास्ताविक। विस्थापन नामक इति का अथ है संस्थापन। वह पहला अध्याय है, हालाँकि अनेक पटाक्षेप उसमें निहित हैं। इसे नज़रंदाज़ करना ख़ुद विस्थापन को अधूरा बना देना है और ऐसा होता रहा है।

जैसे पेड़ की तरह रहना कुछ कम रहना हो। जैसे खड़े-खड़े या बैठे-बैठे या लेटे-लेटे मर जाना कुछ कम जीवन हो। जैसे रोज़मर्रा के मरण में कुछ कम अमरत्व हो। इस उपेक्षा के कारण स्थान के साथ कलाकार के संबंधों की अभिनव पद्धतियों का आविष्कार और प्रचार-प्रसार नहीं हो सका, बल्कि दोनों को अलग-अलग कर दिया गया। कुछ लोग सनक में या फ़ैशन में मातृभूमियों को गाली देने लगे। ज़्यादा चालाक लोगों ने बहिर्गमन कर लिया और दूर जाकर अपनी-अपनी ज़मीन के लिए हाहाकार करने लगे। ये सब ओढ़े हुए विस्थापन थे और नकली अफ़सोस। भीतर से प्रसन्न आत्माएँ शोक का मुकुट लगाकर घूम रही थीं। यशस्वी लोग परदेस में रहकर नियमन करना चाहते लोग थे।

लेकिन उस्ताद ने इबारत को उल्टी तरफ़ से पढ़ा। उन्होंने जगह में रहते हुए भूमण्डल तक का सफ़र किया। वे ख़ूब-ख़ूब घूमे किन्तु भटके नहीं और भटके तो घर आकर। वे अपनी आत्मा से निकली गलियों में भटके और दूसरों में प्रवेश कर गये। वे जीवन से निकली नदी के तट पर भटके और मंदिरों के नौबतख़ानों में बैठे मिले। भटकते हुए उनका बाजा शहर में खो गया जिसे हम आज तक ढूँढते हैं। और अब यह जाने बग़ैर काम नहीं चलता कि बनारस में उनसे जुड़ी हरेक जगह उनकी शहनाई के निर्माण की तरह नज़र आती है।


उस्ताद बिस्मिल्लाह खां
उस्ताद

हम शहर में क्या खोजते? हमने हमेशा उसे छिपने के लिए इस्तेमाल किया। वह एक गाढ़ा पर्दा था हमारे लिए। लोगों की आदतों, लिप्तताओं, विकलताओं, ज़िदों, सुलहों और कलहों, निराशाओं, नींदों और स्वप्नों के तत्वों से बना हुआ। उस्ताद ने इन्हीं तत्वों में से तत्व चुने और कला के शरीर का निर्माण कर लिया। उनकी शहनाई हमेशा लोगों के तत्वों से बनी और बढ़ी है। वह, मसलन, हिन्दुओं की प्रसन्नता और मुसलमानों के शोक से बनी है। आख़िरी बरस को छोड़कर वह आजीवन बनारस में मुहर्रम की पांचवीं और आठवीं तारीख को कर्बला के वीरों की शहादत की याद में आँसुओं का नज़राना पेश करते रहे। हुसैन का ग़म बजाते रहे। यह मातम के जुलूस में आगे-आगे बजती हुई शहनाई और शोक का नेतृत्व करती हुई धुन थी।

उस्ताद ने अपनी जीवन-साधारणता को कला के नक्शों में ढाल लिया था। उनकी ज़िन्दगी के सादा, ग़रीब और निरलंकृत शिल्प को उनकी शहनाई के अप्रत्याशित से जोड़े बग़ैर मूल्यांकन के काम अपर्याप्त और हवाई बने रहेंगे। एक दुनिया थी जो उस्ताद को दे दी गयी थी। वह उसके साथ सपनों की दुनिया की तरह पेश आते थे और कला के स्वप्नमय संसार को अपनी अभिव्यक्ति से आमफ़हम बना देते थे। उनकी कला का गन्तव्य दी हुई दुनिया को सपनों की दुनिया से जोड़ने में है। हिन्दुओं के यहाँ ख़ुशी के अवसरों पर बजने वाली धुनों को उन्होंने एक असंभव प्राकृत सरलता के साथ बजाया है। उनके जटिल कलात्मक अंतःकरण में दाख़िल होकर उन पारम्परिक धुनों का ‘मूल’ तनिक भी बदला नहीं है। प्रायः यह होता है कि लोक रूप किसी कलाकार की अभ्यास और अनुभवसिद्ध चेतना के हवाले होकर परिपक्व और स्वीकार्य होते जाते हैं। वन्य परिवेश एक साफ़ सुथरा बागीचा बनता जाता है। उस्ताद का रास्ता उल्टा था। और अब हालत यह है कि उनकी शहनाई से निकले रूप ही असल और अविकल हैं।

उस्ताद को एक लम्बा जीवन और विचित्र संक्रमणशील ऐतिहासिक समय सीखने के लिए मिला। इस तथ्य में उनकी कला के ज़रूरी रहस्य निहित हैं। 18 मार्च, 1916 को डुमराव (बिहार) में जन्म के कुछ समय बाद वह मामू के पास 22 में बनारस आ गये। मामू ही उनके गुरु हुए। बाद में उस्ताद उनकी सम्पत्ति के भी वारिस हो गये। 40 में मामू और 57 में बड़े पिताजी के इन्तकाल के बाद एक बड़े कुटुम्ब की सारी ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर थी। यह आन्दोलनकारी अग्रगामिता का युग था; हालाँकि राजाओं, महाराजाओं के यहाँ झूले भी पड़ रहे थे। दोनों जगहों का संगीत था। उस्ताद ने दोनों में अकुंठ हिस्सेदारी की। उन्होंने दम तोड़ती सामंती महफ़िलों में प्राण फूँके और लोकतंत्र के नये दरबार में भी रोशनी बिखेरी।

यह बात आज कुछ शर्मिन्दा करती है कि बनारस और इर्दगिर्द के छोटे-बड़े कई कथित राजाओं और लोकतंत्र के नये दिग्गजों के वह लगभग अन्त तक, समय-समय पर दरबारी रहे। कमलापति त्रिपाठी, सम्पूर्णानन्द और सुधाकर पाण्डेय जैसे प्रभावशाली कांग्रेसी नेताओं के सम्मुख उनके क्षुद्र घरेलू आयोजनों में उस्ताद ने एक दर्जा नीचे रहकर, ज़मीन पर बैठकर लेकिन उतनी ही निष्ठा के साथ बार-बार अपना बाजा बजाया। लेकिन वक़्त का इंसाफ़ देखिये - आज वे आयोजन और उनके प्रचंड आयोजक ज़्यादा से ज़्यादा इसलिए याद किये जाते हैं कि उनमें उस्ताद की शहनाई भी थी। इन विविध आयोजनों से उस्ताद ने बहुत कुछ सीखा। राजाओं की महफ़िल में उन्हें अपने शाश्वत संगीत-सहचर मिले। सिद्धेश्वरी और गिरिजा, बैजनाथ प्रसाद सारंगिये मिले, विलायत खाँ और अनोखेलाल से मुलाक़ात हुई। ये सभी जुगलबंदियाँ जीवनपर्यन्त और मृत्योपरान्त चलीं। वे अब भी जारी हैं और उनकी गूँज कभी भी सुनी जा सकती है।

वे सरकारी टेलीविजन के सामने निर्वस्त्र होने से बचने के दिन थे। हम धीरे-धीरे शर्माना सीख रहे थे और डरते थे कि कहीं सलमा सुल्तान, शम्मी नारंग, मंजरी जोशी, वेद प्रकाश, जे.वी. रमण या निथि रविन्द्रन नंगा न देख लें। ‘द वर्ल्ड दिस वीक’ में डिजिटल तरीक़े से रिकॉर्ड किये गये तबले ने बस अभी ही तड़तडाना शुरू किया था। उसी समय वहीं पहली बार उस्ताद से सामना हुआ। वे अपने विनोद से विनोद दुआ को निरुत्तर कर रहे थे। बातचीत के विवरणों की बजाय स्थानीय बनारसी भोजपुरी में बोले गये उनके कुछ वाक्य बाक़ी रह गये, जिनमें से एक था - ''का रजा................. ? ''

उस्ताद को तकलीफ़ और उम्मीद की शर्तों पर ही ढूँढा जा सकता है, अन्यथा तो उन्हें गुज़रे चार बरस हो चुके हैं। अरसा बाद उनके मोहल्ले की एक ऐसी पीढ़ी सड़क पार करना और स्कूल ड्रेस पहनना सीख रही है जो उस्ताद का नाम और पता पूछने पर बस मुस्करा देती है। यह पीढ़ी बड़ी होकर पाठ्यक्रमों के ज़रिये उन्हें जानेगी, उनके घर की दीवार छूकर नहीं। उस्ताद के घर से कुछ दूर पर बेनियाबाग मैदान है जहाँ उनके शरीर को लाखों लोगों के दर्शन के लिए रखा गया था - उनकी प्रिय जगह - यहाँ बैठकर उन्होंने स्थानीय फुटबाल टीमों के अनगिनत मैच देखे और फुटबालरों का संरक्षण किया।

बरसात की एक सुबह इस कीचड़ भरे मैदान में निरुद्देश्य अतर्कित बैठे रहना उन्हें खोजना है, लेकिन मैदान की दूसरी विडम्बनाओं पर निगाह चली जाती है। कभी यही अपने युवजन लड़ाकों के साथ मिलकर राजनारायण ने विक्टोरिया की प्रस्तर-प्रतिमा का ध्वंस किया था। दशकों तक वह जगह खाली थी - उस्ताद की ग़ैरमौजूदगी की तरह। बाद में जब मुलायम सिंह यादव जैसे समाजवाद के स्वयंभू वारिस दृश्य में आये तो उन्होंने बिल्कुल विक्टोरिया वाली जगह पर राजनारायण की मूर्ति लगवा दी। प्रतिमा का विकल्प प्रतिमा। यह बरसात का ही असर होगा कि उस मूर्ति में राजनारायण मुलायम जैसे दिखते हैं।

एक और बनारसी दिग्गज उपन्यास-सम्राट प्रेमचन्द की तरह उस्ताद भी सिनेमा और मुंबई से भागते रहे। वह प्रेमचन्द की तरह असफल नहीं हुए फिर भी भागे। उन्हें यहाँ के अलावा कहीं नहीं टिकना था। 41 के आसपास उनका मुंबई आना-जाना शुरू हुआ। वहाँ नौशाद और वसंत देसाई उनके दोस्त हुए। ‘किनारा’ नामक फ़िल्म में वह साइड हीरो की भूमिका में उतरे। फ़िल्म की नायिका गीता बाली थीं। पुराने लोग बताते हैं कि फ़िल्म बनारस में खेली (चली) भी थी। इस बीच कपूर परिवार से उनकी दोस्ती हो गई और बदले में हमारी सभ्यता को एक विलक्षण म्यूज़िक पीस उपहार की तरह मिला जो 'आवारा'के प्रसिद्ध गीत ‘घर आया मेरा परदेसी’ में मुखड़े और अन्तरे के दरम्यान और दो अन्तरों के बीच बजता है।

वह धुन कालजयी उम्मीद और प्रेम की सिग्नेचर ट्यून के तौर पर जीवित रहेगी। ‘बाबुल’ में शमशाद बेगम के एक गाने के साथ भी उनकी शहनाई ने संगत की। यह सारा काम खेल-खेल में, लीलाभाव से किया गया है। ज़ाहिर है कि उस दौर में पैसा मुद्दा नहीं था। कुछ समय बाद, 56 से कुछ पहले, निर्माता-निर्देशक-फाइनेंसर विजय भट्ट का भट्ठा बैठा हुआ था और वह संगीत को केन्द्र में रखकर फ़िल्म बनाना चाहते थे। वसंत देसाई के ज़रिये उन्होंने उस्ताद को पुकारा। उस्ताद को फिर लगभग मुफ़्त में बजाना था। उन्होंने वसंत को भरोसा दिया कि खरमास (वह महीना जिसमें शादी-ब्याह आदि मंगल कार्य नहीं होते) और इसलिए उस्ताद और उन जैसे दूसरे शहनाई वादक इस समय खाली रहते हैं।) बाद वह मुंबई पहुँच जाएंगे।

इस फ़िल्म में उस्ताद ने बहुत कुछ बजाया। वह सब जो शादी में बजता है, जो दृश्य के कुछ और हरे हो जाने पर बजता है, जो दिल के टूट जाने पर बजता है। जब एक स्थानीय धुन उस्ताद की साँस में अनूदित होकर ‘गूँज उठी शहनाई’ का प्रसिद्ध गीत बनी तो उसके शब्द ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया’ और उन्हें स्वर देने वाली लता मंगेशकर की आवाज़ इतिहास बन गयी। यह इस फ़िल्म की एक क्षुद्र ख़ासियत थी कि इसने उस्ताद के मित्र हो गये विजय भट्ट को फिर से समृद्ध और स्थापित कर दिया।

बाद में बजती शहनाईयों में उस्ताद को ढूँढ़ने के प्रयत्न में गुम हो जाने का जोख़िम है। उनके स्वाभाविक वारिस और बेटे नैयर हुसैन भी अब दुनिया में नहीं हैं। नैयर के अलावा बेटे ज़ामिन और भांजे मुमताज हुसैन बेहतरीन शहनाई बजाते हैं। शिष्यों - शैलेष भागवत और कादिर दरवेश का देश-विदेश में बड़ा जलवा है। लेकिन जिस चीज़ को ये सभी शिष्य गुरु का आशीर्वाद और अपनी सबसे बड़ी ताक़त मानते हैं, दुर्भाग्य से वही उनकी सीमा है। इनमें से किसी को बजाते हुए अलग-अलग पहचाना नहीं जा सकता। अगर सुनने वाला आँख बन्द कर ले और चेले अपना सर्वोत्तम बजा रहे हों तो ये बिस्मिल्लाह खाँ से भिन्न कुछ भी नहीं है। उस्ताद की परछाई भीतर तक घुस गई है और कोई निदान नहीं है।

दरअसल शहनाई साँस का बाजा है और मंच पर एक शहनाई एक साँस कम पड़ जाती है। उस्ताद अपने लगभग दर्जन पर शागिर्दों के साथ प्रस्तुति करते थे। इन सभी लोगों ने लम्बे दौर तक उनके साथ संगत की है। उनकी अधूरी और स्थगित साँस को पूरा किया है। इसका फ़ायदा बहुत हुआ होगा लेकिन नुक़सान यह हुआ कि इनकी छोटी-छोटी साँसें उस्ताद की बड़ी केन्द्रीय साँस में विलीन हो गयी। ये सभी लोग उस्ताद की खण्ड-खण्ड अभिव्यक्ति या उपस्थिति हैं। इनकी कला उस्ताद के न होने का प्रमाण है।

तकरीबन दो सौ लोगों का उस्ताद का कुनबा अपनी भौतिक स्थिति से संतुष्ट है लेकिन भीतर कहीं न कहीं दूसरे बिस्मिल्लाह का बेसब्र इन्तज़ार भी चल रहा है। घर के कई पुरूष सदस्य शहनाई के साथ मेहनत कर रहे हैं तो ज़ाहिर है कि उनके लिए वह जीविकोपार्जन-मात्र नहीं है। इस संतोष और इस बेसब्र इंतज़ार में बिस्मिल्लाह खाँ जीवित हैं। जब तक शहनाई बज रही है और ख़ुद को इस मुल्क की जनता के सुख और दुःख के साथ जोड़ रही है, उस्ताद जीवित हैं। हड़हा सराय के अपने छोटे से पुश्तैनी मकान में वह बकरी को सानी-पानी दे रहे हैं या चारपाई पर अधलेटे होकर सिगरेट पी रहे हैं।

[लेखक व्योमेश शुक्ल हिन्दी के कवि, आलोचक और नाटककार हैं. उनसे vyomeshshukla@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.]

(प्रस्तुति – सिद्धांत मोहन)

घटते पारसी, सोती सरकार!

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Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net

दिनों-दिन तेज़ी से घट रही पारसियों की जनसंख्या को रोकने के लिए सरकार ने जो स्कीम लांच की थी, वो खुद अपनी अंतिम दिन गिन रही है. न सिर्फ़ इस स्कीम के बजट के साथ खिलवाड़ किया गया, बल्कि ज़मीनी स्तर पर भी इसका क्रियान्वयन न के बराबर है. हैरानी की बात यह है कि यूपीए सरकार से लेकर मोदी सरकार सभी ने इस मामले में एक ही रास्ते को फॉलो किया है.

छोटे अल्पसंख्यकों की जनसंख्या में गिरावट रोकने के लिए (Scheme for containing population decline of small minorities) स्कीम की शुरूआत भारत सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के.रहमान खान ने नई दिल्ली में 23 सितम्बर 2013 को की. इस स्कीम को ‘जियो पारसी’ का नाम दिया गया.

TwoCircles.netको अल्पसंख्यक मंत्रालय से मिले दस्तावेज़ बताते हैं कि साल 2012-13 में केन्द्र सरकार के इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा था, लेकिन रिलीज किया गया सिर्फ़ 1 लाख रूपये और यह रक़म सरकारी तिजोरी में पड़ा रहा.

इसी तरह साल 2013-14 में भी इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा गया, रिलीज़ किया गया 66 लाख रूपये और खर्च हुआ 41 लाख रूपये.

साल 2014-15 में सरकार बदली. इस सरकार ने भी इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा, 50 लाख रिलीज़ किया और पूरे 50 लाख खर्च भी हो गए.

साल 2015-16 में पारसियों की घटती हुई आबादी पर ज़्यादा फिक्रमंद हुई और बजट को बढ़ाकर 4 करोड़ कर दिया गया. लेकिन अल्पसंख्यक मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि जून 2015 तक एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया है. जबकि इस बार के नए बजट में वापस इस स्कीम के बजट को घटाकर 2 करोड़ कर दिया गया है.

हालांकि पारसियों की जनसंख्या बढ़ाने की ये स्कीम अपने आप में बेहद ही आकर्षक थी. जिस अंदाज़ में इस स्कीम को सजा-संवार कर पेश किया गया था, उसका हश्र बताता है कि वो सारी बातें कागज़ी थीं.

इस स्कीम के तहत सरकार ज़रूरतमंद गर्भवती पारसी औरतों को आर्थिक सहायता के साथ-साथ उनके बच्चे की देखभाल के लिए भी मदद का प्रावधान है. इस स्कीम के तहत उन कपल्स को इन विट्रो फर्टिलाइजेशन जैसी सुविधाओं के लिए नि:शुल्क मदद मिलेगी, जिनकी सालाना आय 10 लाख रुपए से कम है. इस स्कीम का फ़ायदा उन गैर पारसी महिलाओं को मिलेगा, जिन्होंने पारसी पुरुषों से शादी की है. इतना ही नहीं, इन लक्षित समूहों में बच्चों को जन्म देने की क्षमता वाले पारसी दम्पति और अपने माता- पिता तथा क़ानूनी संरक्षकों की सहमति से नपुंसकता जैसी बीमारियों का पता लगाने के लिए युवकों, महिलाओं, किशोरों और किशोरियों की सहायता करना भी शामिल है.

दरअसल, यह स्कीम एक समुदाय चालित कार्यक्रम है, जिसमें पारजोर फाउण्डेशन, बॉम्बे पारसी पंचायत और स्थानीय अंजुमन शामिल हैं.

सरकार ने इस 'जियो पारसी'स्कीम को प्रमोट करने के लिए अब तक 25 से ज्यादा प्रिंट विज्ञापन लॉन्च किए जा चुके हैं. ये विज्ञापन हमेशा विवादों में रहे हैं. इन विज्ञापनों में कंडोम का इस्तेमाल न करने की नसीहत दी गई है. इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि अगर पारसियों ने शादी करके बच्चे नहीं पैदा किए तो जल्द ही पारसी कॉलोनी 'हिंदू कॉलोनी'में तब्दील हो जाएगी. विज्ञापनों में 40 की उम्र के हो चुके उन अविवाहित पारसी पुरुषों का मज़ाक उड़ाया गया है, जो अभी भी अपनी मां के साथ रह रहे हैं. इसके अलावा, उन महिलाओं पर भी निशाना साधा गया है, जो शादी के लिए बहुत ही योग्य पुरुषों की तलाश कर रही हैं. इसके लिए बाक़ायदा रतन टाटा के नाम का ज़िक्र भी किया गया है.

स्पष्ट रहे कि जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ इस समाज की आबादी लगातार घटती जा रही है. 1941 में इनकी आबादी जहां 1 लाख 14 हज़ार थी, वहीं 2001 में यह सिर्फ़ 69,601 रह गए. इनकी आबादी इस क़दर घट रही है कि अब सरकारी जनगणना से इनका ज़िक्र गायब हो चुका है. 2011 के जनगणना की रिपोर्ट में इनकी आबादी का कोई ज़िक्र नहीं है. लेकिन पारसी समुदाय खुद मानता है कि इस समय देश भर में इनकी संख्या 64 हजार के आसपास है.

अपनी घटती जनसंख्या की फ़िक्र पारसी समाज को भी है. इसीलिए पारसी पंचायत ने खुद दस साल पहले अपनी घटती आबादी को रोकने के लिए एक नई योजना शुरू की थी. जिसके तहत हर पारसी परिवार को उनके तीसरे बच्चे के पालन-पोषण के लिए हर महीने 1000 रूपए दिए जाते थे. लेकिन 10 सालों में केवल 90 परिवारों ने ही तीसरे बच्चे को जन्म दिया.

पारसियों की घटती आबादी वाक़ई चिंता का विषय है. मगर सरकार ने इस स्कीम को सिर्फ़ ‘विज्ञापन’ तक समेट कर रख दिया है. ज़मीनी हक़ीक़त यही है कि इस स्कीम के नाम पर महज़ खानापूर्ति की जा रही है. अब तक जो भी पैसा इस स्कीम पर खर्च किया गया है वो सिर्फ़ विज्ञापन पर ही हुए है. ऐसे में अगर इस स्कीम का यही हाल रहा तो वो दिन भी दूर नहीं, जब पारसियों के बारे में सिर्फ़ किताबों में पढ़ा जाएगा.

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असम : ‘फिसड्डी’ नज़र आ रहे हैं ‘सांसद निधि’ खर्च करने में बीजेपी-कांग्रेस सांसद!

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Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net

असम का ‘चुनावी संग्राम’ आरंभ हो चुका है. तमाम पार्टियां असमियों को असम के विकास के लोकलुभावन सपने दिखा रहे हैं. केन्द्र की सत्ता पर क़ाबिज़ बीजेपी बांग्लारदेशी घुसपैठियों की समस्याी वाले मुद्दे को छोड़ अब विकास को ही मुख्य मुद्दा बनाने का फैसला कर लिया है. बीजेपी के मुख्यमंत्री प्रत्याशी और केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने शनिवार को ही कहा है कि –‘विधानसभा चुनाव के बाद असम राज्य अल्प-विकसित नहीं रहेगा.’

लेकिन इन सबके बीच हक़ीक़त यही है कि यहां के नेताओं ने कभी भी असम के विकास पर खास तवज्जो नहीं दिया. विधायकों की बात यदि छोड़ दिया जाए तो यहां के सांसदों ने भी चुनावी साल होने के बावजूद यहां के विकास पर कभी कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया. खासतौर पर वो सांसद जो विकास के वादे के साथ ही सत्ता में आए थे.

एमपी लैड्स फंड की वेबसाइट पर मौजूद सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि असम के दो-तीन सांसदों को छोड़कर कोई भी सांसद ऐसा नहीं है, जिसने अपने लोकसभा क्षेत्र में ‘सांसद निधि’ का पूरा पैसा खर्च किया हो. यानी असम के ज़्यादातर सांसद पिछले दो वर्षों के दौरान अपने कोटे से 50 फीसदी धनराशि भी कल्याण कार्यों पर खर्च नहीं कर पाए हैं.

स्पष्ट रहे कि 14 लोकसभा सीटों वाले इस असम में 2014 लोकसभा चुनाव में 7 सीटों पर बीजेपी ने बाज़ी मारी थी. तीन सीटें कांग्रेस और तीन सीटें यहां के एयूडीएफ़ के झोली में गिरे थे. वहीं एक सीट पर निर्दलीय सांसद का क़ब्ज़ा है.

हम यहां यह भी बताते चलें कि लोकसभा नियमानुसार सांसदों को अपने-अपने संसदीय क्षेत्र में विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए हर वर्ष 5 करोड़ रुपए की धनराशि दी जाती है. सांसद इसे अपनी इच्छा के अनुसार अनुदान के रूप में दे सकता है.

MP LADS FUNDS DETAILS

एमपी लैड्स फंड की वेबसाइट पर मौजूद सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ असम के 14 सांसदों में कोकराझार के निर्दलीय सांसद नबा कुमार सारानिया (हीरा) ने अपने कुल अनुदान का सबसे अधिक 66.28 फ़ीसदी हिस्सा खर्च किया है.

दूसरे नंबर पर लखीमपुर के बीजेपी सांसद व केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल है, जिन्हें बीजेपी ने इस बार बतौर मुख्यमंत्री प्रत्याशी पेश कर रही है. इन्होंने दो वर्षों के दौरान अपने सांसद निधी का 58.59 फ़ीसदी हिस्सा खर्च किया है.

विकास कार्यो पर खर्च करने के मामले में तीसरे नंबर पर अजमल की पार्टी एयूडीएफ़ के करीमगंज सांसद राधेश्याम विश्वास हैं. चौथे व पांचवें नम्बर पर क्रमशः एयूडीएफ़ के बरपेटा सांसद सिराजुद्दीन अजमल व कांग्रेस के सांसद विरेन सिंह हैं.

कालियाबोर व गुवाहटी सांसद सबसे पीछे

सांसद निधि खर्च करने के मामले में कालियाबोर के कांग्रेसी सांसद गौरव गोगई तथा गुवाहटी के बीजेपी सांसद बिजोय चक्रवर्ती सबसे पीछे हैं. एमपी लैड्स फंड्स की वेबसाईट पर मौजूद जानकारी के अनुसार गौरव गोगई इन दो वर्षों के दौरान अपने संसदीय क्षेत्र कालियाबोर में अपने कुल फंड का महज़ 26.47 फ़ीसदी हिस्सा तथा बिजोय चक्रवर्ती अपने संसदीय क्षेत्र गुवाहटी में 26.73 फ़ीसद हिस्सा ही खर्च कर पाए हैं.

सांसद निधी कम खर्च करने के मामले में तीसरे नंबर पर डिब्रुगढ़ के बीजेपी सांसद रामेश्वर तेली का नाम है.

संकट में अल्पसंख्यक शोध छात्रों की फेलोशिप!

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Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net

अल्पसंख्यक छात्रों के ऊंची तालीम हासिल करने की उम्मीदों पर पलीता लगता नज़र आ रहा है. इसकी अहम वजह अल्पसंख्यक मंत्रालय और यूजीसी (जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत है) की हीला-हवाली या यूं कह लें कि ज़बरदस्त लाल-फीताशाही है या फिर मोदी सरकार की सोची-समझी साज़िश...

देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में एम.फिल व पीएचडी जैसी ऊंचे दर्जे की पढ़ाई कर रहे सैकड़ों छात्रों की शिकायत है कि यूजीसी ने अल्पसंख्यक छात्रों के लिए सबसे ज़रूरी यह फेलोशिप सितम्बर-अक्टूबर महीने से ही नहीं दी गई है, जिससे अल्पसंख्यक छात्रों की शोध-शिक्षा संकट में आ गई है. इस तरह से सरकार न सिर्फ़ अल्पसंख्यक छात्रों की उम्मीदों पर पानी फेर रही है, बल्कि उनकी ऊंची तालीम पाने की हसरत पर भी कुल्हाड़ी मार दी है.

TwoCircles.netको अल्पसंख्यक मंत्रालय से मिले दस्तावेज़ बताते हैं कि सत्ता में आने के साथ ही मोदी सरकार की मंशा इस अहम फेलोशिप को बंद कर देने की रही. ये दीगर बात है कि इस बार इस फेलोशिप का बजट बढ़ाया ज़रूर गया है और सरकार इस फेलोशिप को मांग-प्रेरित बनाने की बात भी कर रही है.

स्पष्ट रहे कि इस फेलोशिप की शुरूआत यूपीए सरकार ने 2009 में किया था. शोध छात्रों का कहना है इस फेलोशिप के मिलने में कभी कोई समस्या नहीं हुई. लेकिन अब वही छात्र बताते हैं कि 2014 में केन्द्र में सत्ता बदलते ही फेलोशिप के मिलने में दिक्कतें आने लगीं हैं.

TwoCircles.netके पास मौजूद दस्तावेज़ बताते हैं कि साल 2009-10 में इस फेलोशिप के लिए सरकार ने 15 करोड़ का बजट रखा गया और 14.90 खर्च किया गया. साल 2010-11 में इस फेलोशिप का बजट बढ़ाकर डबल कर दिया गया. इस बार 30 करोड़ के बजट में 29.98 करोड़ रूपये छात्रों के फेलोशिप में बांट दी गई.

साल 2011-12 में बजट 52 करोड़ हुआ और 51.98 करोड़ खर्च किया गया. साल 2012-13 में बजट 70 करोड़ हो गया और 66 करोड़ की रक़म फेलोशिप में बांट भी दी गई.

साल 2013-14 की भी यही कहानी थोड़ी अलग रही. इस साल इस फेलोशिप के लिए बजट तो 90 करोड़ का रखा गया लेकिन रिलीज़ सिर्फ़ 50.11 करोड़ रखा गया और खर्च 50.02 करोड़ हुआ.

लेकिन साल 2014-15 में सरकार बदलते ही इस फेलोशिप का बजट घटा दिया गया. इस साल इस फेलोशिप की बजट फिर से 50 करोड़ कर दिया गया. लेकिन हैरानी की बात यह है कि रिलीज़ सिर्फ़ 1 करोड़ ही किया गया और उसमें भी खर्च महज़ 12 लाख रूपये ही हुए.

साल 2015-16 की कहानी तो और भी गंभीर है. इस साल इस फेलोशिप के लिए 49.83 करोड़ रखा गया, लेकिन जून 2015 तक के उपलब्ध आंकड़ें बताते हैं कि इस फेलोशिप पर सिर्फ़ 3 लाख रूपये ही खर्च किए गए हैं.

यह अलग बात है कि इस बार इस फेलोशिप पर मोदी सरकार थोड़ी मेहरबान नज़र आ रही है. साल 2016-17 के बजट में इस फेलोशिप का बजट बढ़ाकर 80 करोड़ किया है, लेकिन आगे इसका हश्र देखना दिलचस्प होगा.

आगे के आंकड़ें थोड़े और भी दिलचस्प हैं. अल्पसंख्यक मंत्रालय के आंकड़ें बताते हैं कि सिर्फ़ 756 शोध-छात्रों का चयन किया गया, जिसमें सिर्फ़ 494 मुस्लिम छात्रों को चयनित किया गया है. वहीं इस सूची में 90 क्रिश्चन, 65 सिक्ख, 25 बौद्ध, 20 जैन और 02 पारसी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले छात्र हैं.

हालांकि इसके पहले के दस्तावेज़ बताते हैं कि पहले इस फेलोशिप के लिए अधिक मुस्लिम छात्रों का चयन किया जाता था. उदाहरण के तौर पर साल 2011-12 में 533, साल 2010-11 में 532 और 2009-10 में 541 मुस्लिम शोध-छात्रों का चयन किया गया था.

सवाल यह है कि मुस्लिम छात्रों के साथ ही ये भेदभाव क्यों हो रहा है? ये इकलौती ऐसी स्कीम नहीं है. ऐसी कई स्कीमों में अल्पसंख्यक बिरादरी से ताल्लुक़ रखने वाले छात्रों ने यही अंजाम देखा है. क्या यह सोची-समझी रणनीत का हिस्सा है? अगर ये सच है तो अल्पसंख्यकों की पैरोकारी करने वाले नेता व पार्टियों को चाहिए कि वो जल्द से जल्द इस मुद्दे को संसद में उठाए ताकि अपने कैरियर की फ़िक्र कर रहे छात्रों के उम्मीदों को ख़त्म होने से बचाया जा सके.

हालांकि ऐसा नहीं है कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं हुई है. राज्यसभा में भी यह मुद्दा उठ चुका है, लेकिन वहां भी यह मुद्दा सिर्फ़ सवाल-जवाब में उलझा रहा.

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ‘सबका साथ –सबका विकास’ के नारे के साथ जो सरकार अल्पसंख्यकों के शैक्षिक सशक्तिकरण के लाख दावे कर रही है. अब वही सरकार अल्पसंख्यक छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ क्यों कर रही है?

यह कितना अजीब है कि एक तरफ़ तो सरकार अल्पसंख्यकों के शैक्षिक उत्थान की बातें कर रही है, मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसे सपने दिखा रही है, दूसरी तरफ़ छात्रों को मिलने वाले इस महत्वपूर्ण फेलोशिप पर गलत नज़रिए के साथ बंद करने की तैयारी कर रही है.

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यूपी में जंगलराज : दलित बस्ती में लगाई आग, दो मासूम जले

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TwoCircles.net News Desk

लखनऊ :सीतापुर के लहरपुर थाने के पट्टी देहलिया गांव में दलित बस्ती के 35 घरों में आग लगाने और 2 मासूम बच्चों के जिंदा जला दिए जाने की घटना सामने आई है.

आरोप है कि प्रधानी चुनाव में कहने पर भी जब एक दलित परिवार ने अपना वोट यूपी के सीतापुर में नहीं दिया तो प्रधान ने अपने समर्थकों के साथ दलित बस्ती में आग लगा दी.

इस घटना में दो बच्चों की ज़िंदा जलकर मौत हो गई और बस्ती के 35 से ज्यादा घर आग में पूरी तरह जलकर खाक हो गए.

इस घटना को लखनऊ की सामाजिक संगठन रिहाई मंच ने सपा सरकार में दलितों और गरीबों पर हो रहे हमलों का ताज़ा उदाहरण बताया है.

मंच ने कहा कि सपा सरकार के चार साल पर हुई यह जघन्य घटना सीतापुर के रेवसा के बिंबिया गांव में 8 मार्च 2012 को सपा को जनादेश मिलने के बाद दलितों के 13 घरों के जला दिए जाने की घटना की याद दिलाती है. जिसे सपाईयों ने इसलिए अंजाम दिया था कि दलितों ने सपा को वोट नहीं दिया था.

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के महासचिव राजीव यादव ने कहा कि दलितों द्वारा प्रधानी के चुनाव में कमलेश वर्मा नाम के प्रत्याशी को सिर्फ वोट नहीं देने के कारण उनकी पूरी बस्ती को जला दिया जाना, जिसमें दो बच्चे पूरी तरह जलकर राख हो गए, सपा की दलित विरोधी मध्ययुगीन बर्बरता का प्रमाण है.

उन्होंने कहा कि आगजनी के दौरान खुद प्रधान द्वारा अपने हाथों से दलितों के मकानों में आग लगाना यह साबित करता है कि प्रदेश में अपराधियों का मनोबल बढ़ा हुआ है.

राजीव यादव ने कहा कि देवरिया के मदनपुर थाना में देवकली जयराम गांव में दलित महिला लालमति के घर में घुसकर दबंगों द्वारा गला रेतकर की गई हत्या जैसी घटनाएं साफ़ कर रही हैं कि यूपी में दलितों के खिलाफ़ ये हमले प्रायोजित हैं.

अख़लाक के हत्यारों को क्लीन चिट दिलवा रही है सपा सरकार!

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TwoCircles.net News Desk

लखनऊ :दादरी के बिसाहड़ा गांव में अख़लाक के हत्या में शामिल एक आरोपी सोनू सिसौदिया को पुलिस ने क्लीन चिट दे दी है.

दादरी के डीएसपी आनंद सिंह का कहना है कि जिस वक़्त दादरी के बिसाहड़ा गांव में अख़लाक की हत्या की गई थी, उस वक्त आरोपी सोनू सिसौदिया गांव में था ही नहीं. जांच के मुताबिक़ उस वक्त आरोपी एक शापिंग मॉल में था.

सोनू सिसौदिया को मिले इस क्लीनचिट के बाद रिहाई मंच नेता शकील कुरैशी का कहना है कि –‘दादरी कांड में जिस तरह से दोषियों को क्लीन चिट दी जा रही है, उसने एक बार फिर साबित किया है कि मुज़फ्फ़रनगर से लेकर फैजाबाद-अस्थान तक जिस तरह से भाजपा व संघ परिवार के लोगों को सपा बचा रही है, वही काम वह दादरी में भी कर रही है.’

उन्होंने आरोप लगाया कि इंसाफ़ का क़त्ल करने की इसी साजिश के तहत सपा ने दादरी, मुज़फ्फ़रनगर समेत किसी भी सांप्रदायिक घटना की सीबीआई जांच नहीं करवाई.

कुरैशी ने आरोप लगाया कि लव जिहाद की तरह विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के लोग हिंदू लड़कियों की रक्षा के नाम पर 400 संघी गुण्डों की फौज तैयार कर रहे हैं और सपा सरकार मौन है.

उन्होंने कहा कि पूरे प्रदेश में जिस तरह से दलितों और मुसलमानों पर हमले बढ़ रहे हैं वह साफ़ कर रहा है कि प्रदेश को सपा-भाजपा दोनों हिंसा की आग में झोंकना चाहते हैं.

बता दें कि पुलिस ने अख़लाक हत्याकांड में पुलिस ने 15 लोगों को आरोपी बनाया था. अब इस मामले में केवल 14 लोग ही आरोपी बचे हैं. हालांकि अभी सोनू को जेल से रिहा नहीं किया गया है, लेकिन उसकी रिहाई की कार्रवाई शुरू कर दी गई है.

रोटी-दाल… या फिर अबीर गुलाल?

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भारत…
यहां तो हर दिन होली है!
आतंकी खेलते हैं बेगुनाहों के खून से
और ‘देशभक्त’ व ‘दंगाई’ अपनों का ही
लाल रंग बेरंग पानी में बहा देते हैं!

कोई सुबह ऐसी नहीं…
जब ख़बरों में छाया नोटों का रंग
या दहेज़ के सोने का पीलापन
किसी अभागिन की मांग के लाल रंग को
लाल लहू में तब्दील कर न बहता दिखे!

कोई खुद को केसरिया रंग में रंग
तिरंगे पर उन्माद का दाग़ लगा रहा
तो किसी की ज़िंदगी इस क़दर रंगीन है
कि दूसरे रंग की गुंजाइश ही नहीं!

महंगाई की पिचकारी से
कब के धुल चुके हैं…
ग़रीबों की ज़िन्दगी के सारे रंग !

इन बेचारों को तो
होली के नज़राने के तौर पर
पीली-गुलाबी रंग की दाल भी नसीब नहीं…

किसी तरह रोज़ के चार दाने जुटा भी लें
तो पकाने को
क़ीमती लाल रंग का सिलिण्डर कहां से लायें?

किसानों की ज़िन्दगी भी अब बद से बदरंग हो चुकी
सूखे के क़हर ने
सोख लिया है खेतों का हरा-पीला रंग

उन किसानों के लिये बाकी है
सिर्फ अंधेरे का
काला रंग…

वो कोई रंग चढ़ाए क्या
कोई रंग छुटाए क्या!

एक बेबस सा सवाल ये भी
कि वो घर लाए क्या?
रोटी-दाल…
या फिर अबीर गुलाल?

कितनी अजीब दुनिया है…
रंगीन सपने दिखा
नेता बदल लेते हैं अपना रंग!
और ग़रीब की किस्मत को
उम्र भर जोड़ना होता है
बदले हुए रंगो का हिसाब

जल्द ही छूट जाते हैं
होली के रंग
बस बचे रहते हैं
देश के सीने पर
दाग़ की तरह चिपके
आम सपनों की
गुमनाम मौत के स्याह रंग !

यह कविता ‘अफ़रोज़ आलम साहिल’ द्वारा लिखी गई है. आप उनसे afroz@twocircles.netपर सम्पर्क कर सकते हैं.

भगत सिंह का आलेख - मैं नास्तिक क्यों हूं

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शहीद भगत सिंह

[आज यानी 23 मार्च को देश में होली मनायी जा रही है तो शहीद भगत सिंह की शहादत की पुण्यतिथि भी. लाहौर में अपने जेलप्रवास के दौरान शहीद भगत सिंह ने बहुत सारे विरोधाभासों और लांछनों के बीच इस लेख को ५ अक्टूबर 1930 को लिखा था. पहली बार लाहौर से प्रकाशित अंग्रेज़ी पत्र ‘द पीपुल’ के 27 सितम्बर 1931 के अंक में प्रकाशित हुआ था. मूल लेख का स्वरुप ज्यादा बड़ा और कठिन है. आलेख थोडा लंबा है, लेकिन आशा है कि पाठक इसे पढ़ेंगे. यह भगत सिंह के सबसे चर्चित लेखकीय कामों में से एक रहा है.]


BHAGAT SINGH

लाहौर पुलिस स्टेशन में भगत सिंह

एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त – शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ – मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है, और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है। ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया?

मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूँ – यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनो ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार, दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ।

मेरा नास्तिकतावाद कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है। मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान था। कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाये। यद्यपि मैं कुछ अध्यापकों का चहेता था तथा कुछ अन्य को मैं अच्छा नहीं लगता था। पर मैं कभी भी बहुत मेहनती अथवा पढ़ाकू विद्यार्थी नहीं रहा। अहंकार जैसी भावना में फँसने का कोई मौका ही न मिल सका। मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था, जिसकी भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी। मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। एक आर्य समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता। अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डी0 ए0 वी0 स्कूल, लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे एक साल उसके छात्रावास में रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थना के अतिरिक्त में घण्टों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन दिनों मैं पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। जहाँ तक धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतन्त्रता के ध्येय के लिये अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली। किन्तु वे नास्तिक नहीं हैं। उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास है। वे मुझे प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के लिये प्रोत्साहित करते रहते थे। इस प्रकार से मेरा पालन-पोषण हुआ। असहयोग आन्दोलन के दिनों में राष्ट्रीय कालेज में प्रवेश लिया। यहाँ आकर ही मैंने सारी धार्मिक समस्याओं – यहाँ तक कि ईश्वर के अस्तित्व के बारे में उदारतापूर्वक सोचना, विचारना तथा उसकी आलोचना करना शुरू किया। पर अभी भी मैं पक्का आस्तिक था। उस समय तक मैं अपने लम्बे बाल रखता था। यद्यपि मुझे कभी-भी सिक्ख या अन्य धर्मों की पौराणिकता और सिद्धान्तों में विश्वास न हो सका था। किन्तु मेरी ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ निष्ठा थी। बाद में मैं क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा। वहाँ जिस पहले नेता से मेरा सम्पर्क हुआ वे तो पक्का विश्वास न होते हुए भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस ही नहीं कर सकते थे। ईश्वर के बारे में मेरे हठ पूर्वक पूछते रहने पर वे कहते, ‘'जब इच्छा हो, तब पूजा कर लिया करो।'’ यह नास्तिकता है, जिसमें साहस का अभाव है। दूसरे नेता, जिनके मैं सम्पर्क में आया, पक्के श्रद्धालु आदरणीय कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल आजकल काकोरी षडयन्त्र केस के सिलसिले में आजीवन कारवास भोग रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ ईश्वर की महिमा का ज़ोर-शोर से गान है। उन्होंने उसमें ईश्वर के ऊपर प्रशंसा के पुष्प रहस्यात्मक वेदान्त के कारण बरसाये हैं। 28 जनवरी, 1925 को पूरे भारत में जो ‘दि रिवोल्यूशनरी’ (क्रान्तिकारी) पर्चा बाँटा गया था, वह उन्हीं के बौद्धिक श्रम का परिणाम है। उसमें सर्वशक्तिमान और उसकी लीला एवं कार्यों की प्रशंसा की गयी है। मेरा ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव क्रान्तिकारी दल में भी प्रस्फुटित नहीं हुआ था। काकोरी के सभी चार शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन-प्रार्थना में गुजारे थे। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ एक रूढ़िवादी आर्य समाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने वृहद अध्ययन के बावजूद राजेन लाहड़ी उपनिषद एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सब मे सिर्फ एक ही व्यक्ति को देखा, जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था, ‘'दर्शन शास्त्र मनुष्य की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है। वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है। परन्तु उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की।

इस समय तक मैं केवल एक रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे। अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने के लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली। न और अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास। यथार्थवाद हमारा आधार बना। मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला। मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता माक्र्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बाद में मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन और संचालन किया, एक कोरी बकवास है। मैंने अपने इस अविश्वास को प्रदर्शित किया। मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की। मैं एक घोषित नास्तिक हो चुका था।

मई 1927 में मैं लाहौर में गिरफ़्तार हुआ। रेलवे पुलिस हवालात में मुझे एक महीना काटना पड़ा। पुलिस अफ़सरों ने मुझे बताया कि मैं लखनऊ में था, जब वहाँ काकोरी दल का मुकदमा चल रहा था, कि मैंने उन्हें छुड़ाने की किसी योजना पर बात की थी, कि उनकी सहमति पाने के बाद हमने कुछ बम प्राप्त किये थे, कि 1927 में दशहरा के अवसर पर उन बमों में से एक परीक्षण के लिये भीड़ पर फेंका गया, कि यदि मैं क्रान्तिकारी दल की गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला एक वक्तव्य दे दूँ, तो मुझे गिरफ़्तार नहीं किया जायेगा और इसके विपरीत मुझे अदालत में मुखबिर की तरह पेश किये बेगैर रिहा कर दिया जायेगा और इनाम दिया जायेगा। मैं इस प्रस्ताव पर हँसा। यह सब बेकार की बात थी। हम लोगों की भाँति विचार रखने वाले अपनी निर्दोष जनता पर बम नहीं फेंका करते। एक दिन सुबह सी0 आई0 डी0 के वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन ने कहा कि यदि मैंने वैसा वक्तव्य नहीं दिया, तो मुझ पर काकोरी केस से सम्बन्धित विद्रोह छेड़ने के षडयन्त्र तथा दशहरा उपद्रव में क्रूर हत्याओं के लिये मुकदमा चलाने पर बाध्य होंगे और कि उनके पास मुझे सजा दिलाने व फाँसी पर लटकवाने के लिये उचित प्रमाण हैं। उसी दिन से कुछ पुलिस अफ़सरों ने मुझे नियम से दोनो समय ईश्वर की स्तुति करने के लिये फुसलाना शुरू किया। पर अब मैं एक नास्तिक था। मैं स्वयं के लिये यह बात तय करना चाहता था कि क्या शान्ति और आनन्द के दिनों में ही मैं नास्तिक होने का दम्भ भरता हूँ या ऐसे कठिन समय में भी मैं उन सिद्धान्तों पर अडिग रह सकता हूँ। बहुत सोचने के बाद मैंने निश्चय किया कि किसी भी तरह ईश्वर पर विश्वास तथा प्रार्थना मैं नहीं कर सकता। नहीं, मैंने एक क्षण के लिये भी नहीं की। यही असली परीक्षण था और मैं सफल रहा। अब मैं एक पक्का अविश्वासी था और तब से लगातार हूँ। इस परीक्षण पर खरा उतरना आसान काम न था। ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है। निर्णय का पूरा-पूरा पता है। एक सप्ताह के अन्दर ही यह घोषित हो जायेगा कि मैं अपना जीवन एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ। इस विचार के अतिरिक्त और क्या सान्त्वना हो सकती है? ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएँ मिल जायेंगे, जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा। वे शोषकों, उत्पीड़कों और अत्याचारियों को चुनौती देने के लिये उत्प्रेरित होंगे। इस लिये नहीं कि उन्हें राजा बनना है या कोई अन्य पुरस्कार प्राप्त करना है यहाँ या अगले जन्म में या मृत्योपरान्त स्वर्ग में। उन्हें तो मानवता की गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं शान्ति स्थापित करने के लिये इस मार्ग को अपनाना होगा। क्या वे उस रास्ते पर चलेंगे जो उनके अपने लिये ख़तरनाक किन्तु उनकी महान आत्मा के लिये एक मात्र कल्पनीय रास्ता है। क्या इस महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ लगाया जायेगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण बोलने का साहस करेगा? या तो वह मूर्ख है या धूर्त। हमें चाहिए कि उसे क्षमा कर दें, क्योंकि वह उस हृदय में उद्वेलित उच्च विचारों, भावनाओं, आवेगों तथा उनकी गहराई को महसूस नहीं कर सकता। उसका हृदय मांस के एक टुकड़े की तरह मृत है। उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों के प्रेतों की छाया पड़ने से वे कमज़ोर हो गयी हैं। स्वयं पर भरोसा रखने के गुण को सदैव अहंकार की संज्ञा दी जा सकती है। यह दुखपूर्ण और कष्टप्रद है, पर चारा ही क्या है?

आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था। अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जायेगा। यदि उसके तर्क इतने अकाट्य हैं कि उनका खण्डन वितर्क द्वारा नहीं हो सकता और उसकी आस्था इतनी प्रबल है कि उसे ईश्वर के प्रकोप से होने वाली विपत्तियों का भय दिखा कर दबाया नहीं जा सकता तो उसकी यह कह कर निन्दा की जायेगी कि वह वृथाभिमानी है। यह मेरा अहंकार नहीं था, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया। मेरे तर्क का तरीका संतोषप्रद सिद्ध होता है या नहीं इसका निर्णय मेरे पाठकों को करना है, मुझे नहीं। मैं जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास ने आज मेरा जीवन आसान और मेरा बोझ हलका कर दिया होता। उस पर मेरे अविश्वास ने सारे वातावरण को अत्यन्त शुष्क बना दिया है। थोड़ा-सा रहस्यवाद इसे कवित्वमय बना सकता है। किन्तु मेरे भाग्य को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए। मैं यथार्थवादी हूँ। मैं अन्तः प्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय चाहता हूँ। इस ध्येय में मैं सदैव सफल नहीं हुआ हूँ। प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है। सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है। कोई भी मनुष्य, जिसमें तनिक भी विवेक शक्ति है, वह अपने वातावरण को तार्किक रूप से समझना चाहेगा। जहाँ सीधा प्रमाण नहीं है, वहाँ दर्शन शास्त्र का महत्व है। जब हमारे पूर्वजों ने फुरसत के समय विश्व के रहस्य को, इसके भूत, वर्तमान एवं भविष्य को, इसके क्यों और कहाँ से को समझने का प्रयास किया तो सीधे परिणामों के कठिन अभाव में हर व्यक्ति ने इन प्रश्नों को अपने ढ़ंग से हल किया। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों में हमको इतना अन्तर मिलता है, जो कभी-कभी वैमनस्य तथा झगड़े का रूप ले लेता है। न केवल पूर्व और पश्चिम के दर्शनों में मतभेद है, बल्कि प्रत्येक गोलार्ध के अपने विभिन्न मतों में आपस में अन्तर है। पूर्व के धर्मों में, इस्लाम तथा हिन्दू धर्म में ज़रा भी अनुरूपता नहीं है। भारत में ही बौद्ध तथा जैन धर्म उस ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है, जिसमें स्वयं आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे विरोधी मत पाये जाते हैं। पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक चार्वाक है। उसने ईश्वर को पुराने समय में ही चुनौती दी थी। हर व्यक्ति अपने को सही मानता है। दुर्भाग्य की बात है कि बजाय पुराने विचारकों के अनुभवों तथा विचारों को भविष्य में अज्ञानता के विरुद्ध लड़ाई का आधार बनाने के हम आलसियों की तरह, जो हम सिद्ध हो चुके हैं, उनके कथन में अविचल एवं संशयहीन विश्वास की चीख पुकार करते रहते हैं और इस प्रकार मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं।

सिर्फ विश्वास और अन्ध विश्वास ख़तरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन रूढ़िगत विश्वासों को चुनौती देनी होगी। प्रचलित मतों को तर्क की कसौटी पर कसना होगा। यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेगा। तब नये दर्शन की स्थापना के लिये उनको पूरा धराशायी करकेे जगह साफ करना और पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग करके पुनर्निमाण करना। मैं प्राचीन विश्वासांे के ठोसपन पर प्रश्न करने के सम्बन्ध में आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन परम आत्मा का, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करता है, कोई अस्तित्व नहीं है। हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगतिशील आन्दोलन का ध्येय मनुष्य द्वारा अपनी सेवा के लिये प्रकृति पर विजय प्राप्त करना मानते हैं। इसको दिशा देने के पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है। यही हमारा दर्शन है। हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं।

यदि आपका विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बतायें कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया – असंख्य दुखों के शाश्वत अनन्त गठबन्धनों से ग्रसित! एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतृष्ट नही है। कृपया यह न कहें कि यही उसका नियम है। यदि वह किसी नियम से बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। वह भी हमारी ही तरह नियमों का दास है। कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका मनोरंजन है। नीरो ने बस एक रोम जलाया था। उसने बहुत थोड़ी संख्या में लोगांें की हत्या की थी। उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने पूर्ण मनोरंजन के लिये। और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाये जाते हैं। पन्ने उसकी निन्दा के वाक्यों से काले पुते हैं, भत्र्सना करते हैं – नीरो एक हृदयहीन, निर्दयी, दुष्ट। एक चंगेज खाँ ने अपने आनन्द के लिये कुछ हजार जानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं। तब किस प्रकार तुम अपने ईश्वर को न्यायोचित ठहराते हो? उस शाश्वत नीरो को, जो हर दिन, हर घण्टे ओर हर मिनट असंख्य दुख देता रहा, और अभी भी दे रहा है। फिर तुम कैसे उसके दुष्कर्मों का पक्ष लेने की सोचते हो, जो चंगेज खाँ से प्रत्येक क्षण अधिक है? क्या यह सब बाद में इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और गलती करने वालों को दण्ड देने के लिये हो रहा है? ठीक है, ठीक है। तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे, जो हमारे शरीर पर घाव करने का साहस इसलिये करता है कि बाद में मुलायम और आरामदायक मलहम लगायेगा? ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापक कहाँ तक उचित करते थे कि एक भूखे ख़ूंख़्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि, यदि वह उससे जान बचा लेता है, तो उसकी खूब देखभाल की जायेगी? इसलिये मैं पूछता हूँ कि उस चेतन परम आत्मा ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों की रचना क्यों की? आनन्द लूटने के लिये? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?

तुम मुसलमानो और ईसाइयो! तुम तो पूर्वजन्म में विश्वास नहीं करते। तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने शब्द द्वारा विश्व के उत्पत्ति के लिये छः दिन तक क्यों परिश्रम किया? और प्रत्येक दिन वह क्यों कहता है कि सब ठीक है? बुलाओ उसे आज। उसे पिछला इतिहास दिखाओ। उसे आज की परिस्थितियों का अध्ययन करने दो। हम देखेंगे कि क्या वह कहने का साहस करता है कि सब ठीक है। कारावास की काल-कोठरियों से लेकर झोपड़ियों की बस्तियों तक भूख से तड़पते लाखों इन्सानों से लेकर उन शोषित मज़दूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक निरुत्साह से देख रहे हैं तथा उस मानवशक्ति की बर्बादी देख रहे हैं, जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा, और अधिक उत्पादन को ज़रूरतमन्द लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देना बेहतर समझने से लेकर राजाआंे के उन महलों तक जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है- उसको यह सब देखने दो और फिर कहे – सब कुछ ठीक है! क्यों और कहाँ से? यही मेरा प्रश्न है। तुम चुप हो। ठीक है, तो मैं आगे चलता हूँ।

और तुम हिन्दुओ, तुम कहते हो कि आज जो कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं और आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनन्द लूट रहे हैं। मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे। उन्होंने ऐसे सिद्धान्त गढ़े, जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफ़ी ताकत है। न्यायशास्त्र के अनुसार दण्ड को अपराधी पर पड़ने वाले असर के आधार पर केवल तीन कारणों से उचित ठहराया जा सकता है। वे हैं – प्रतिकार, भय तथा सुधार। आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धान्त की निन्दा की जाती है। भयभीत करने के सिद्धान्त का भी अन्त वहीं है। सुधार करने का सिद्धान्त ही केवल आवश्यक है और मानवता की प्रगति के लिये अनिवार्य है। इसका ध्येय अपराधी को योग्य और शान्तिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है। किन्तु यदि हम मनुष्यों को अपराधी मान भी लें, तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिये गये दण्ड की क्या प्रकृति है? तुम कहते हो वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है। तुम ऐसे 84 लाख दण्डों को गिनाते हो। मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर इनका सुधारक के रूप में क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो, जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गधा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण न दो। मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। और फिर क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है। गरीबी एक अभिशाप है। यह एक दण्ड है। मैं पूछता हूँ कि दण्ड प्रक्रिया की कहाँ तक प्रशंसा करें, जो अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे? क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था या उसको भी ये सारी बातें मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो, किसी गरीब या अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का क्या भाग्य होगा? चूँकि वह गरीब है, इसलिये पढ़ाई नहीं कर सकता। वह अपने साथियों से तिरस्कृत एवं परित्यक्त रहता है, जो ऊँची जाति में पैदा होने के कारण अपने को ऊँचा समझते हैं। उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं। यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोेगेगा? ईष्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दण्ड के बारे में क्या होगा, जिन्हें दम्भी ब्राह्मणों ने जानबूझ कर अज्ञानी बनाये रखा तथा जिनको तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों – वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा सहन करने की सजा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिये कौन ज़िम्मेदार होगा? और उनका प्रहार कौन सहेगा? मेरे प्रिय दोस्तों! ये सिद्धान्त विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं। ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं। अपटान सिंक्लेयर ने लिखा था कि मनुष्य को बस अमरत्व में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसकी सारी सम्पत्ति लूट लो। वह बगैर बड़बड़ाये इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा। धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबन्धन से ही जेल, फाँसी, कोड़े और ये सिद्धान्त उपजते हैं।

मैं पूछता हूँ तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को क्यों नहीं उस समय रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? यह तो वह बहुत आसानी से कर सकता है। उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं की लड़ने की उग्रता को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे बचाया? उसने अंग्रेजों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने की भावना क्यों नहीं पैदा की? वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार त्याग दें और इस प्रकार केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव समाज को पूँजीवादी बेड़ियों से मुक्त करें? आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं। मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह लागू करे। जहाँ तक सामान्य भलाई की बात है, लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं। वे इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं। परमात्मा को आने दो और वह चीज को सही तरीके से कर दे। अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिये नहीं है कि ईश्वर चाहता है बल्कि इसलिये कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं। वे हमको अपने प्रभुत्व में ईश्वर की मदद से नहीं रखे हैं, बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे। यह हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निन्दनीय अपराध – एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचार पूर्ण शोषण – सफलतापूर्वक कर रहे हैं। कहाँ है ईश्वर? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? एक नीरो, एक चंगेज, उसका नाश हो!

क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति तथा मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूँ। चाल्र्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसे पढ़ो। यह एक प्रकृति की घटना है। विभिन्न पदार्थों के, नीहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी। कब? इतिहास देखो। इसी प्रकार की घटना से जन्तु पैदा हुए और एक लम्बे दौर में मानव। डार्विन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो। और तदुपरान्त सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति के लगातार विरोध और उस पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा से हुआ। यह इस घटना की सम्भवतः सबसे सूक्ष्म व्याख्या है।

तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अन्धा या लंगड़ा पैदा होता है? क्या यह उसके पूर्वजन्म में किये गये कार्यों का फल नहीं है? जीवविज्ञान वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाल लिया है। अवश्य ही तुम एक और बचकाना प्रश्न पूछ सकते हो। यदि ईश्वर नहीं है, तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर सूक्ष्म तथा स्पष्ट है। जिस प्रकार वे प्रेतों तथा दुष्ट आत्माओं में विश्वास करने लगे। अन्तर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और दर्शन अत्यन्त विकसित। इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को है, जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे तथा उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे। सभी धर्म, समप्रदाय, पन्थ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं। राजा के विरुद्ध हर विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है।

मनुष्य की सीमाओं को पहचानने पर, उसकी दुर्बलता व दोष को समझने के बाद परीक्षा की घड़ियों में मनुष्य को बहादुरी से सामना करने के लिये उत्साहित करने, सभी ख़तरों को पुरुषत्व के साथ झेलने तथा सम्पन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिये ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना हुई। अपने व्यक्तिगत नियमों तथा अभिभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ा कर कल्पना एवं चित्रण किया गया। जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है, तो उसका उपयोग एक भय दिखाने वाले के रूप में किया जाता है। ताकि कोई मनुष्य समाज के लिये ख़तरा न बन जाये। जब उसके अभिभावक गुणों की व्याख्या होती ह,ै तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है। जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों द्वारा विश्वासघात तथा त्याग देने से अत्यन्त क्लेष में हो, तब उसे इस विचार से सान्त्वना मिल सकती हे कि एक सदा सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसको सहारा देगा तथा वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिये उपयोगी था। पीड़ा में पड़े मनुष्य के लिये ईश्वर की कल्पना उपयोगी होती है। समाज को इस विश्वास के विरुद्ध लड़ना होगा। मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है, तब उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पुरुषत्व के साथ सामना करना चाहिए, जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं। यही आज मेरी स्थिति है। यह मेरा अहंकार नहीं है, मेरे दोस्त! यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है। ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।

हमें देखना है कि मैं कैसे निभा पाता हूँ। मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात बतायी तो उसने कहा, ‘'अपने अन्तिम दिनों में तुम विश्वास करने लगोगे।'’ मैंने कहा, ‘'नहीं, प्यारे दोस्त, ऐसा नहीं होगा। मैं इसे अपने लिये अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझाता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूँगा।'’ पाठकों और दोस्तों, क्या यह अहंकार है? अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ।

... तो भगत सिंह और उनके साथी ये नारे क्यों लगाते थे?

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Nasiruddin Haider Khan for TwoCircles.net

कोई नारा, कोई शख्स या संगठन यूं ही नहीं लगाता. नारों का मुकम्मल दर्शन होता है. वे दर्शन, महज़ चंद शब्दों के ज़रिए विचारों की शक्ल में ज़ाहिर होते हैं. ये मौजूदा हालात पर टिप्पाणी करते हैं. अक्सर ये आने वाले दिनों का ख़ाका भी ज़ाहिर करते हैं. इसलिए कुछ लोग या संगठन कुछ नारों पर ज़ोर देते हैं और कुछ, कुछ नारों से दूर रहते हैं. इसलिए नारों के पीछे छिपे विचारों को जानना, उनके इतिहास को समझना ज़रूरी होता है.

आज 23 मार्च है. 1931 में आज ही के दिन सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह को फांसी दी गई थी. ऐसे वक़्त में जब नारों के ज़रिए खेमेबंदी हो रही हो, यह देखना दिलचस्प होगा कि आज़ादी के आंदोलन की सबसे मज़बूत क्रांतिकारी धारा ने अपने लिए क्या नारे चुने थे.

इतिहासकार बताते हैं कि हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) की ओर से जब भगत सिंह और बटुकेश्वदर दत्त ने असेम्बली में बम फेंका तो उन्होंने तीन नारे लगाए. ये नारे थे- ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’, ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ और ‘दुनिया के मज़दूरों एक हों’...

भगत सिंह और उनके साथियों का एक और संगठन था, नौजवान भारत सभा... इरफ़ान हबीब बताते हैं कि वह (नौजवान भारत सभा), साम्प्रदायिक सौहार्द्र को राजनीतिक कार्यक्रम का एक अहम हिस्सा मानती थी. लेकिन कांग्रेस के विपरीत वह न तो अलग-अलग धार्मिक मतों के तुष्टिकरण में यक़ीन करती थी और न ही सेक्यूलरिज़्म के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए ‘अल्लाहो अकबर’, ‘सत श्री अकाल’ और ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाती थी. इसके विपरीत वह ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ और ‘हिन्दुस्तान ज़िन्दाबाद’ के नारे लगाती थी.

इंक़लाब ज़िन्दाबाद

यानी अगर भगत सिंह और उनके साथियों के ख्याल को समझना है, तो इन नारों को समझना ज़रूरी है. इन नारों में सबसे अहम नारा है, ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’

बम कांड में गिरफ्तारी के बाद सबसे ज्यादा इसी नारे पर चर्चा हुई. ज़िन्दगी के आख़िरी दो साल, भगत सिंह के विचारों की पुख्तगीक के भी साल हैं. इसलिए इस नारे का ज़िक्र कई मौक़ों पर वे करते हैं.

उनमें इंक़लाब और बाकी नारों का खाका, परत दर परत साफ़ होता जाता है. इंक़लाब शब्द के आधार पर जब इन्हें घेरने की कोशिश हुई तो वे एक सम्पादक को लिखते हैं, ‘…‘इंक़लाब’ शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिए. इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएं जोड़ी जाती हैं. क्रांतिकारियों की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है.’

...क्रांति (इंक़लाब) का अर्थ अनिवार्य रूप में सशस्त्र आंदोलन नहीं होता. बम और पिस्तौ‍ल कभी-कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं... केवल इस कारण से बम और पिस्तौल क्रांति के पर्यायवाची नहीं हो जाते. ...क्रांति शब्द का अर्थ ‘प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा है.’ लोग साधरणतया जीवन की परंपरागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से ही कांपने लगते हैं. यही एक अकर्मण्यता की भावना है, जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जाग्रत करने की आवश्यकता है.

दुनिया के मज़दूरों एक हों

सवाल यह भी था कि इंक़लाब क्यों होना चाहिए और इंक़लाब के बाद क्या होगा?

भगत सिंह जवाब देते हैं, ‘क्रांति के लिए खूनी लड़ाइयां अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है. वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है. क्रांति से हमारा अभिप्राय है –अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन. समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जाता है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं. दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं. दुनिया भर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैय्या कराने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढ़कने भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है. सुंदर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गंदे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवनलीला समाप्त कर जाते हैं. इसके विपरीत समाज के शोषक पूंजीपति ज़रा-ज़रा सी बात के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं.’

भगत सिंह के विचार के मुताबिक़ इंक़लाब समाज के सबसे दबे-कुचले लोगों के लिए होगा.

साम्राज्यवाद मुर्दाबाद यानी साम्राज्यवाद का नाश हो

दुनिया के मज़दूर क्यों एक हों? एक होकर क्या करेंगे?

भगत सिंह लिखते हैं, ‘...देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यक/ता है. ...जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य तथा राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जो साम्राज्यशाही के नाम से विख्यात है, समाप्त नहीं कर दिया जाता, तब तक मानवता को उसके क्लेरशों से छुटकारा मिलना असंभव है. ...क्रांति मानवजाति का जन्मजात अधिकार है.... स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है, जनता की सर्वोपरि सत्ता की स्थापना श्रमिक वर्ग का अंतिम लक्ष्य है. ...क्रांति की इस पूजा-वेदी पर हम अपना यौवन नैवेद्य के रूप में लाए हैं...’

हिन्दोस्तां ज़िन्दाबाद

भगत सिंह और उनके साथियों का एक अहम दस्तावेज़ है, क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा. ये इनके उन नारों के दर्शन का निचोड़ है, जिसे उन्होंने नया मुल्क बनाने के लिए अपनाया था. इनका हिन्दोस्तां, महज़ नक्शा नहीं है. इसमें भारत में रहने वाले किसान और मज़दूर हैं.

इस मसौदे की चंद बातें देखें तो यह बात साफ़ हो जाती है. जैसे- ‘इंक़लाब का सिर्फ़ एक ही अर्थ हो सकता है, जनता के लिए जनता की राजनीतिक शक्ति हासिल करना. क्रांति जनता के लिए होगी. इंक़लाब के बाद साफ़-साफ़ निर्देश होंगे –सामंतवाद की समाप्ति. किसानों के कर्जे ख़त्म करना. क्रांतिकारी राज्य की और भूमि का राष्ट्रीयकरण ताकि सुधरी हुई व साझी खेती स्थापित की जा सके. रहने के लिए आवास की गारंटी. किसानों से लिए जाने वाले सभी खर्च बंद करना. सिर्फ़ इकहरा भूमिकर लिया जाएगा. कारखानों का राष्ट्रीयकरण और देश में कारखाने लगाना. आम शिक्षा. काम करने के घंटे ज़रूरत के अनुसार कम करना.’

कुल मिलाकर यह मुकम्मल जीता-जागता समाज बनाने का खाका है.

इस मौसेदे को अमली जामा पहनाने के लिए वे नौजवानों से मुख़ातिब होते हैं और कहते हैं, ‘इंक़लाब का अर्थ मौजूदा सामाजिक ढांचे में पूर्ण परिवर्तन और समाजवाद की स्थापना है.’

विचार की सान पर इंक़लाब

और दुनिया भर के विचारों को मथते हुए, वे इस नतीजे पर पहुंचते हैं, ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था, जो आमतौर पर ग़लत अर्थ में समझा जाता है. पिस्तौल और बम इंक़लाब नहीं लाते, बल्कि इंक़लाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है... हमारे इंक़लाब का अर्थ पूंजीवादी युद्धों की मुसीबतों का अंत करना है. मुख्य उद्देश्य और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया समझे बिना किसी के सम्बंध में निर्णय देना उचित नहीं है. ग़लत बातें हमारे साथ जोड़ना साफ़-साफ़ अन्याय है.’

भगत सिंह ने असेम्बली में बम के साथ जो पर्चा फेंका, उसमें लिखा था, ‘…व्यक्तियों की हत्या करना तो सरल है, किंतु विचारों की हत्या नहीं की जा सकती’

ज़ाहिर है, भगत सिंह और उनके साथियों ने जैसा मुल्क देखने या बनाने का ख्वाब देखा था, वैसा हुआ नहीं. लेकिन क्यां वे ख्याल और ख्वाब मर गए?

अगर ऐसा है तो फिर आज इंक़लाब ज़िन्दाबाद या हिन्दोस्तां ज़िन्दाबाद का मतलब क्या होगा? भगत सिंह ने फांसी से 20 दिन पहले अपने भाई को एक खत लिखा और उसमें एक गज़ल लिखी. इसकी आखिरी दो लाइनें हैं,

हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे!

तो क्या भगत सिंह के ख्याल की बिजली अब भी कौंध रही है?

नोट : इन किताबों से मदद ली गई है-

1. बहरों को सुनाने के लिए, पेज़- 58-59, एस. इरफ़ान हबीब, राहुल फाउंडेशन,

2. इंक़लाब जिंदाबाद क्या है, मॉर्डन रिव्यू के सम्पादक को भगत सिंह-बीके दत्त का लिखा पत्र, 22 दिसम्बंर 1929, पेज़ 362-363 और बम कांड पर हाईकोर्ट में बयान, पेज़ 296, भगत सिंह और उनके सा‍थियों के दस्तावेज़, सम्पादक –जगमोहन सिंह व चमनलाल, राजकमल प्रकाशन

3. बम कांड पर सेशन कोर्ट में बयान, 6 जून 1929, भगत सिंह के राजनीतिक दस्तावेज़, पेज़ 76-77, सम्पादन -चमनलाल, नेशनल बुक ट्रस्ट‍

जानिए! किसकी वजह से हुई भगत सिंह को फांसी और उसका क्या हुआ हश्र?

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Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net

आज ‘शहीद-ए-आज़म’ भगत सिंह का 85वां शहादत दिवस है. 1931 में आज ही के दिन भगत सिंह को फांसी दी गई थी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्हें फांसी के तख़्ते तक पहुंचाने की सबसे अहम भूमिका किसकी थी? और बाद में उस शख्स का क्या हश्र हुआ?

यह तथ्य दरअसल चम्पारण के बेतिया शहर से जुड़ा हुआ है. बेतिया के ‘क्रांतिकारी’ फणीन्द्र नाथ घोष ‘अखिल भारतीय क्रांतिकारी दल’ की कार्यकारिणी के प्रमुख सदस्य थे. इसी बेतिया में कमलनाथ तिवारी, केदार मणी शुक्ल, गुलाब चन्द्र गुलाली जैसे दर्जनों क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ी हुकूमत का जीना दुश्वार कर रखा था.

काकोरी लूट-कांड के बाद देश में जगह-जगह छापे पड़े. बचते-बचाते 1925 के अंतिम दिनों में चंद्रशेखर आज़ाद बेतिया पहुंचे. घोष ने उन्हें बेतिया के जोड़ा इनार स्थित शिक्षक हरिवंश सहाय के घर पर ठहराया. हरिवंश, पीर मुहम्मद मूनिस के दोस्त थे और ये भी राज हाई स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ कानपुर से निकलने वाले ‘प्रताप’ अख़बार के लिए लिखते थे. सहाय को आज़ाद की मदद करने के जुर्म में इन्हें शिक्षक के पद से बर्खास्त कर दिया गया.

चन्द्रशेखर आज़ाद क़रीब एक महीने हरिवंश सहाय के घर ही रहें. उसके बाद वो 17 दिनों तक केदार मणि शुक्ल के घर रूके. कुछ दिनों नन्हकू सिंह के घर भी रहें. बाद में क्रांतिकारी गुलाब चन्द्र गुलाली ने इन्हें दो दिनों तक एक मंदिर में छिपाकर रखा.

इस काकोरी कांड के बाद, ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन’ पूरी तरह से बिखड़ चुका था. भगत सिंह ने इसे पुनः जीवित करने का बीड़ा उठाया. इसी क्रम में 1927 में भगत सिंह बेतिया फणीन्द्र नाथ घोष के घर पहुंचे. बेतिया में अलग-अलग क्रांतिकारियों के घर कई दिन रहें. तत्पश्चात भगत सिंह, योगेन्द्र शुक्ल से मिलने वैशाली चले गए.

धन-प्रबंधन के लिए समस्तीपुर ज़िला स्थित शाहपुर पटोरी गांव के एक ज़मीनदार के घर (जिसके तिजोरी में तीन लाख रूपये थे) डकैती डालने की असफल कोशिश की गई. इस डकैती की सबसे खास बात यह थी कि इस राजनीतिक डकैती में खुद भगत सिंह व राजगुरू शामिल थे.

8-9 सितंबर, 1928 को दिल्ली के फिरोज़ शाह कोटला के खंडहरों में क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय बैठक बुलाई गई. इस बैठक में बिहार की ओर से दो बेतिया-वासी यानी फणीन्द्र नाथ घोष और मनमोहन बनर्जी ने हिस्सा लिया. इस बैठक की अध्यक्षता भगत सिंह कर रहे थे.

दरअसल इसी बैठक में ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना’ की स्थापना की गई. बिहार का कमान फणीन्द्र नाथ घोष को सौंपा गया.

1928 में ही संगठन ने धन-प्रबंध के लिए बेतिया से कुछ दूरी पर स्थित मौलनिया गांव में हरगुन महतो के घर डाका डालने की योजना बनाई गई. क़िस्मत ने यहां भी क्रांतिकारियों का साथ नहीं दिया. डकैती के क्रम में क्रांतिकारी कमलनाथ तिवारी की कुहनी कट गई. खून रूकने का नाम नहीं ले रहा था. इस क्रम में हंगामा भी ज़्यादा मच गया. मजबूरन न चाहते हुए भी एक खून करके भागना पड़ा.

कमलनाथ तिवारी को बेतिया अस्पताल में भर्ती कराया गया. लेकिन यहां एक खुफिया अधिकारी पहुंच गया और तिवारी जी को पकड़ लिया. इस गिरफ्तारी के बाद से बाकी क्रांतिकारी भी पकड़े गए. हालांकि इनमें से कई फ़रार हो गए. लेकिन बाद में उनकी भी गिरफ़्तारी कहीं न कहीं से हो ही गई.

इस क्रम में फणीन्द्र नाथ घोष माणिकतल्ला स्थित अपने ननिहाल में गिरफ़्तार कर लिए गए. अब वो सरकारी गवाह बन गए थे. अपने ही लोगों के साथ घोष गद्दारी कर चुके थे. उन्हें लाहौर षड़यंत्र के आरोपियों यानी भगत सिंह, राजगुरू, शुखदेव सहित कमलनाथ तिवारी के ख़िलाफ़ गवाही देने के लिए लाहौर ले जाया गया था. यहीं नहीं, मनमोहन बनर्जी भी अब सरकारी गवाह थे.

27 फरवरी, 1931 का वो दिन भी काफी दुर्भाग्यपूर्ण था. किसी भेदिये ने चन्द्रशेखर आज़ाद के बारे में गोरों को जानकारी दे दी कि वे इलाहाबाद स्थित अल्फ्रेड पार्क से गुज़र रहे हैं. खुफिया अधिकारी नॉट बाबर ने वहां मोर्चा संभाल लिया. आज़ाद ने कुछ देर तक अपने माउजर पिस्टल से नॉट बाबर का मुक़ाबला किया, लेकिन जब उन्हें लगा कि वो गिरफ़्तार कर लिए जाएंगे तो उन्होंने आख़िरी गोली अपने सीने में उतार ली और ‘आज़ाद’ हमेशा के लिए आज़ाद होकर इस दुनिया से कूच कर गए.

हालांकि अंग्रेज़ अभी भी कंफ्यूज़न में थे कि कहीं ये आज़ाद न हुआ तो… तब फणीन्द्र नाथ घोष ने सरकारी गवाह के तौर पर आज़ाद के शव की शिनाख्त की थी.

आगे चलकर फणीन्द्र नाथ घोष ने सरकारी गवाह के तौर पर सैण्डर्स-वध कांड और असेम्बली बम कांड मंं भी अपनी गवाही दी और इसी गवाही के आधार पर भगत सिंह, राजगुरू एवं सुखदेव को आरोपी बनाकर उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई.

इधर मौलनिया डाका कांड के बाकी आरोपियों को भी सज़ा सुनाया गया. लेकिन 1932 में योगेन्द्र शुक्ल व गुलाब चन्द्र गुलाली दीवाली की रात खुफिया तरीक़े से भाग निकले. जेल से निकलते ही उन्होंने गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष को सज़ा देने की क़सम खा ली.

इस क़सम को पूरा करने की ज़िम्मेदारी योगेन्द्र शुक्ल के भतीजे बैकुंठ शुक्ल ने अपने कंधों पर ले ली. इनका साथ देने को चन्द्रमा सिंह तैयार हुए. 1932 में ही शीत ऋतु में हत्याकांड को अंतिम रूप देने का निर्णय लिया गया. 9 नवम्बर, 1932 को बेतिया के मीना बाज़ार के पश्चिमी द्वार पर पहुंच कर बैकुंठ शुक्ल और चन्द्रमा सिंह साईकिल से उतरे. एक पान गुमटी पर अपनी साईकिल खड़ी करके फणीन्द्र नाथ घोष की दुकान की ओर बढ़ गए.

घोष के दुकान के आस-पास से भीड़ को हटाने के मक़सद से शुक्ल ने पटाखेनुमा हथगोला ज़मीन पर दे मारा. कर्णभेदी धमाका हुआ. धुंए के गुबार में कुछ भी देख पाना असंभव हो गया. इसी मौक़े का फायदा उठाते हुए शुक्ल ने खुखरी निकाल ली. उधर धमाका होते ही फणीन्द्र नाथ घोष भी सतर्क हो गया कि कहीं उसकी जान के दुश्मन बने इंक़लाबी तो नहीं पहुंच गए.

उसने भी पिस्तौल निकाली, मगर उसे संभलने का मौक़ा दिए बग़ैर शुक्ल जी ने अपनी खुखरी से अंधाधुंध कई वार कर दिए. वार इतने जानलेवा थे कि घोष चीखें मारता ज़मीन पर लोट गया. बेतिया अस्पताल में क़रीब सप्ताह भर ज़िन्दगी व मौत के बीच जूझते हुए फणीन्द्र नाथ घोष की कहानी अब ख़त्म हो चुकी थी.

क्योंकि मामला घोष जैसे सरकारी गवाह का था. पुलिस ने अपनी तफ़्तीश में ज़मीन-आसमान एक कर दिया. आख़िकार 5 जनवरी 1933 को चन्द्रमा सिंह कानपुर से जबकि बैकुंठ शुक्ल 6 जुलाई, 1933 को हाजीपुर पुल के सोनपुर वाले छोर से गिरफ़्तार कर लिए गए. मोतिहारी कोर्ट में मुक़दमा चला. सत्र न्यायाधीश ने 23 फरवरी 1934 को अपना फैसला सुनाया. चन्द्रमा सिंह को 10 साल का कारावास मिला और बैकुंठ शुक्ल को फांसी की सज़ा सुनाई गई.

हालांकि इस फैसले के ख़िलाफ़ पटना हाईकोर्ट में अपील भी की गई, लेकिन यहां भी सज़ा को बरक़रार रखा गया. इस प्रकार बैकुंठ शुक्ल को गया सेन्ट्रल जेल में 14 मई 1934 को फांसी के तख्ते पर चढ़ा पर दिया गया. लेकिन अफ़सोस आज देश की कौन कहे बल्कि चम्पारण के युवा भी शायद बैकुंठ शुक्ल को जानते हों...

लेखक इन दिनों चम्पारण सत्याग्रह व चम्पारण के इतिहास पर शोध कर रहे हैं. उनसे afroz@twocircles.netपर सम्पर्क किया जा सकता है.

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'पाश'की पुण्यतिथि : दो कविताएं

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सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

जालंधर में जन्मे अवतार सिंह संधू 'पाश'भारतीय साहित्य में एक ऐसा नाम रखते हैं, जहां से कविता और क्रान्ति - दोनों की - मजबूती साबित होती है. यह एक तथ्य ही है कि पाश अपने विचारों में वाम से प्रभावित थे लेकिन पाश की कविता की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह भारत के हरेक तबके और हरेक वर्ग के साथ खड़ी है.



अवतार सिंह संधू 'पाश'

23 मार्च की तारीख को सिर्फ भगत सिंह ही नहीं, अवतार सिंह 'पाश'भी शहीद हुए थे. हाँ, शहीद...जब खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा उन्हें 1988 की तारीख को मार दिया गया. पांच कविता संग्रहों के साथ पाश ने अपनी मृत्यु के बाद भी एक गुमनामी की ज़िंदगी जी. अब भी क्रांति के अलावा पाश की कोई याद नहीं है. पाश जनकवि हैं. इसे मानने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए. उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर पढ़िए पाश की दो कविताएं.

मेहनत की लूट

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी, लोभ की मुट्ठी
सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

सबसे खतरनाक वो आँखें होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है..
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अन्धेपन कि भाप पर ढुलक जाती है
जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके ज़िस्म के पूरब में चुभ जाए

अपनी असुरक्षा से

यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना जमीर होना ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाए
आँख की पुतली में हाँ के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है ।

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है
गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफ़ा
लेकिन गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे
क़ीमतों की बेशर्म हँसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से ख़तरा है

गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है ।

[पाश की तस्वीर biharkhojkhabar.com से साभार]