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सांप्रदायिक हिंसा के ख़ात्मे के लिए सख़्ती की ज़रूरत

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By TCN News,

नई दिल्ली: सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं व अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों ने केंद्र तथा राज्य सरकारों से देश के कई भागों में कस्बों व गाँवों में अल्पसंख्यक संप्रदायों को निशाना बनाने व बलपूर्वक दबाने वाले तथा सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने वाले संगठित घृणा और हिंसा अभियानों के ख़ात्मे के लिए त्वरित कार्यवाही की मांग की है.

पिछले कुछ दिनों में ख़ासतौर पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुसलमानों और ईसाईयों के खिलाफ़ संगठनों द्वारा ‘शुद्धिकरण’ और ‘घर वापसी’ के सैकड़ों मामले सामने आये हैं. इन क्षेत्रों में तथाकथित ‘लव जिहाद’ के नाम पर हुए ध्रुवीकरण को लेकर भी वहां के युवा काफ़ी आतंकित हैं. इन असामाजिक संगठनों को केंद्र और स्थानीय राजनेताओं से मिल रहे भारी समर्थन के कारण कई स्थानों पर हिंसा की घटनाएं हुई हैं. 16 मई 2014 को आम चुनावों के परिणाम घोषित होने के बाद से अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ़ हिंसा की 600 से अधिक घटनाएं मीडिया द्वारा प्रकाशित की जा चुकी हैं. राज्य सरकारों ने दोषियों के खिलाफ़ कार्यवाही करने में बहुत सुस्ती दिखाई है. सरकारों के इस सुस्त व नरम रवैये से ऐसे गैरसंवैधानिक तत्वों को और प्रोत्साहन मिला है.



अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों और तेज़ी से बिगड़ते इन हालात की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से कल जंतर मंतर पर एक विरोध जनसभा का आयोजन किया गया. इस जनसभा में वक्ताओं ने प्रधानमंत्री, केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों से सांप्रदायिक घृणा फैलाने वालों और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले लोगों के खिलाफ़ सख़्त कानूनी कार्यवाही करने की मांग की.

अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा, सम्मान से जीने का अधिकार तथा भारत के समान नागरिक होने के अधिकार जैसे मुद्दों को उठाने के लिए 30 नागरिक व संवैधानिक अधिकार संगठनों और अल्पसंख्यक संप्रदाय अधिकार संगठनों द्वारा आयोजित इस सभा में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों पर एक रिपार्ट जारी की गई. कई वक्ताओं का मानना है कि देश में सांप्रदायिक व संगठित हिंसा को किसी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए. ऐसे मामलों को वर्षों तक लंबित रखने की बजाय उन पर त्वरित कार्यवाही की जानी चाहिए.

सम्मेलन में कई वक्ताओं ने कहा कि उन्हें यह आशा थी कि चुनाव के परिणाम आने और केंद्र में सरकार बनने के बाद चुनाव अभियान में चली तीखी बयानबाज़ी बंद हो जाएगी. परंतु नई सरकार के पहले 100 दिनों के शासन में मुसलमानों और ईसाईयों के खिलाफ़ बयानों की आवाज़ और बुलंद हुई है, उनकी पहचान का उपहास किया गया है, उनकी देशभक्ति पर प्रश्न चिन्ह लगे हैं, उनकी नागरिकता पर सवाल उठाए गये हैं, उनके विश्वास का मज़ाक उड़ाया गया है, वह शोचनीय है. इस तरह बलपूर्वक भयपूर्ण विभाजनकारी और अविश्वास का माहौल बनाया जा रहा है. यह माहौल तेज़ी से देश के गाँवों और कस्बों में फैलता जा रहा है. इससे शांति और भाईचारे के सूफ़ी संतों के पैग़ामों और महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों के प्रयासों से जन्मी, सदियों से चली आ रही सांप्रदायिक सौहार्द की भावना को गहरी ठेस पहुँच रही है.

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में ख़ासतौर पर मुसलमानों और उनके धार्मिक स्थलों पर हिंसा की अनेक घटनाएं हुई हैं. इन हिंसा की घटनाओं में देश के विभिन्न भागों में अल्पसंख्यक ईसाई संप्रदाय पर हुए कमोबेश 36 हमलों की ज्ञात घटनाएं भी शामिल हैं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में ईसाई समुदाय, इसके धर्मगुरू, प्रार्थना करने वालों और गिरजाघरों पर भीड़ द्वारा हिंसा करने के दर्जनों मामले सामने आए तथा सरकार का दंगाईयों के प्रति रवैया काफी सुस्त और नरम रहा.

जनसभा में इस बात पर आश्चर्य और निराशा ज़ाहिर हुए कि संयुक्त राष्ट्र अमरिका के सदर्न यूनिवर्सिटी सिस्टम ऑफ़ लुसिआना ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को समेकित विकास और सामाजिक परिवर्तन, विशेषतः गुजराती महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के विकास के लिए किये गये उनके कार्यों को सम्मानित करने के लिए उन्हें डॉक्टरेट उपाधि देने का निर्णय लिया है. हालांकि वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है.

जनसभा से संतुलित समाज के विकास हेतु निम्न मांगें सामने आईं,
१. सांप्रदायिक, सुनियोजित व लक्षित हिंसा को किसी हालात में बर्दाश्त नहीं किया जाए.
२. केन्द्र और राज्य सरकारों को ऐसे लोगों के खिलाफ़ त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए जो अपने बयानों से अल्पसंख्यकों में तनाव की स्थिति पैदा करते हैं.
३. केंद्र तथा राज्यों के गृह मंत्रालयों द्वारा सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे देश के सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करें और किसी विशेष समूह के दबाव में ना आएं व अल्पसंख्यकों का शोषण न करें.
४. सरकार को सभी नागरिकों को आगे बढ़ने के लिए एक समान माहौल और संसाधन देने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा व समानता के अधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक तंत्र विकसित करना चाहिए.

वक्ताओं में जेडीएस के कुँवर दानिश, कांग्रेस के मनीष तिवारी, जदयू के अली अनवर, सीपीआई के अमरजीत कौर, अपूर्वानंद, आर्कबिशप अनिल जेटी काउटो, आर्कबिशप कुरियाकोस भरनीकुलंघरा, बिशप सिमोन जॉन, डॉ. ज़फ़रूल इस्लाम खान, हर्ष मंडेर, हरविंदर सिंह सरन, जॉन दयाल, किरण शाहीन, मनीषा सेठी, मौलाना नियाज़ फ़ारूकी, मोहम्मद नसीम, नावेद हमीद, नूर मोहम्मद, पॉल दिवाकर, सेहबा फ़ारूकी, शबनम हाशमी, सईदा हमीद, ज़ाकिया सोमन शामिल थे.


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