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घटते पारसी, सोती सरकार!

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Afroz Alam Sahil, TwoCircles.net

दिनों-दिन तेज़ी से घट रही पारसियों की जनसंख्या को रोकने के लिए सरकार ने जो स्कीम लांच की थी, वो खुद अपनी अंतिम दिन गिन रही है. न सिर्फ़ इस स्कीम के बजट के साथ खिलवाड़ किया गया, बल्कि ज़मीनी स्तर पर भी इसका क्रियान्वयन न के बराबर है. हैरानी की बात यह है कि यूपीए सरकार से लेकर मोदी सरकार सभी ने इस मामले में एक ही रास्ते को फॉलो किया है.

छोटे अल्पसंख्यकों की जनसंख्या में गिरावट रोकने के लिए (Scheme for containing population decline of small minorities) स्कीम की शुरूआत भारत सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के.रहमान खान ने नई दिल्ली में 23 सितम्बर 2013 को की. इस स्कीम को ‘जियो पारसी’ का नाम दिया गया.

TwoCircles.netको अल्पसंख्यक मंत्रालय से मिले दस्तावेज़ बताते हैं कि साल 2012-13 में केन्द्र सरकार के इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा था, लेकिन रिलीज किया गया सिर्फ़ 1 लाख रूपये और यह रक़म सरकारी तिजोरी में पड़ा रहा.

इसी तरह साल 2013-14 में भी इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा गया, रिलीज़ किया गया 66 लाख रूपये और खर्च हुआ 41 लाख रूपये.

साल 2014-15 में सरकार बदली. इस सरकार ने भी इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा, 50 लाख रिलीज़ किया और पूरे 50 लाख खर्च भी हो गए.

साल 2015-16 में पारसियों की घटती हुई आबादी पर ज़्यादा फिक्रमंद हुई और बजट को बढ़ाकर 4 करोड़ कर दिया गया. लेकिन अल्पसंख्यक मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि जून 2015 तक एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया है. जबकि इस बार के नए बजट में वापस इस स्कीम के बजट को घटाकर 2 करोड़ कर दिया गया है.

हालांकि पारसियों की जनसंख्या बढ़ाने की ये स्कीम अपने आप में बेहद ही आकर्षक थी. जिस अंदाज़ में इस स्कीम को सजा-संवार कर पेश किया गया था, उसका हश्र बताता है कि वो सारी बातें कागज़ी थीं.

इस स्कीम के तहत सरकार ज़रूरतमंद गर्भवती पारसी औरतों को आर्थिक सहायता के साथ-साथ उनके बच्चे की देखभाल के लिए भी मदद का प्रावधान है. इस स्कीम के तहत उन कपल्स को इन विट्रो फर्टिलाइजेशन जैसी सुविधाओं के लिए नि:शुल्क मदद मिलेगी, जिनकी सालाना आय 10 लाख रुपए से कम है. इस स्कीम का फ़ायदा उन गैर पारसी महिलाओं को मिलेगा, जिन्होंने पारसी पुरुषों से शादी की है. इतना ही नहीं, इन लक्षित समूहों में बच्चों को जन्म देने की क्षमता वाले पारसी दम्पति और अपने माता- पिता तथा क़ानूनी संरक्षकों की सहमति से नपुंसकता जैसी बीमारियों का पता लगाने के लिए युवकों, महिलाओं, किशोरों और किशोरियों की सहायता करना भी शामिल है.

दरअसल, यह स्कीम एक समुदाय चालित कार्यक्रम है, जिसमें पारजोर फाउण्डेशन, बॉम्बे पारसी पंचायत और स्थानीय अंजुमन शामिल हैं.

सरकार ने इस 'जियो पारसी'स्कीम को प्रमोट करने के लिए अब तक 25 से ज्यादा प्रिंट विज्ञापन लॉन्च किए जा चुके हैं. ये विज्ञापन हमेशा विवादों में रहे हैं. इन विज्ञापनों में कंडोम का इस्तेमाल न करने की नसीहत दी गई है. इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि अगर पारसियों ने शादी करके बच्चे नहीं पैदा किए तो जल्द ही पारसी कॉलोनी 'हिंदू कॉलोनी'में तब्दील हो जाएगी. विज्ञापनों में 40 की उम्र के हो चुके उन अविवाहित पारसी पुरुषों का मज़ाक उड़ाया गया है, जो अभी भी अपनी मां के साथ रह रहे हैं. इसके अलावा, उन महिलाओं पर भी निशाना साधा गया है, जो शादी के लिए बहुत ही योग्य पुरुषों की तलाश कर रही हैं. इसके लिए बाक़ायदा रतन टाटा के नाम का ज़िक्र भी किया गया है.

स्पष्ट रहे कि जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ इस समाज की आबादी लगातार घटती जा रही है. 1941 में इनकी आबादी जहां 1 लाख 14 हज़ार थी, वहीं 2001 में यह सिर्फ़ 69,601 रह गए. इनकी आबादी इस क़दर घट रही है कि अब सरकारी जनगणना से इनका ज़िक्र गायब हो चुका है. 2011 के जनगणना की रिपोर्ट में इनकी आबादी का कोई ज़िक्र नहीं है. लेकिन पारसी समुदाय खुद मानता है कि इस समय देश भर में इनकी संख्या 64 हजार के आसपास है.

अपनी घटती जनसंख्या की फ़िक्र पारसी समाज को भी है. इसीलिए पारसी पंचायत ने खुद दस साल पहले अपनी घटती आबादी को रोकने के लिए एक नई योजना शुरू की थी. जिसके तहत हर पारसी परिवार को उनके तीसरे बच्चे के पालन-पोषण के लिए हर महीने 1000 रूपए दिए जाते थे. लेकिन 10 सालों में केवल 90 परिवारों ने ही तीसरे बच्चे को जन्म दिया.

पारसियों की घटती आबादी वाक़ई चिंता का विषय है. मगर सरकार ने इस स्कीम को सिर्फ़ ‘विज्ञापन’ तक समेट कर रख दिया है. ज़मीनी हक़ीक़त यही है कि इस स्कीम के नाम पर महज़ खानापूर्ति की जा रही है. अब तक जो भी पैसा इस स्कीम पर खर्च किया गया है वो सिर्फ़ विज्ञापन पर ही हुए है. ऐसे में अगर इस स्कीम का यही हाल रहा तो वो दिन भी दूर नहीं, जब पारसियों के बारे में सिर्फ़ किताबों में पढ़ा जाएगा.

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