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क्यों पेरिस हमलों के विरोध में तस्वीर बदलना एक विवादास्पद फैसला है?

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सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

पेरिसमें शुक्रवार को हुए आतंकी हमले में 150 से ज़्यादा निर्दोष जानें चली गयीं. कई घायल भी हुए. इस दुखद और भर्त्सनायोग्य घटना के बाद समूचे विश्व में शोक है, लोग उदास हैं और फ्रांस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं.

इसी बीच फेसबुक ने फ्रांस के तिरंगे झंडे का सहारा लेते हुए एक ऐसी मुहिम चलाई है, जिसके तहत पूरे विश्व के फेसबुक यूज़र अपनी तस्वीर को फ्रांस के राष्ट्रीय ध्वज के साथ मिला सकते हैं. लोग इस मुहिम में फेसबुक का साथ देते हुए अपनी तस्वीरें बदल भी रहे हैं, जिससे यह भी ज़ाहिर होता जा रहा है कि फ्रांस के इस कठिन समय में डिजिटल क्रान्ति की बदौलत विश्व उसके साथ खड़ा है.

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लेकिन कोई यह कहे कि पेरिस हमलों के विरोध में तस्वीरें बदलना एक गलत फैसला है, तो कैसा लगेगा? ज़ाहिर है कि अजीब लगेगा लेकिन इस गलती को समझने के लिए कुछ गूढ़ बातों को भी ध्यान में रखना होगा.

फेसबुक कई बहानों से प्रोफाइल पिक्चर बदलने की मुहिम लम्बे समय से चलाता रहा है. समलैंगिक मुद्दे हों या भारत में अपनी डिजिटल इंडिया मुहिम का परोक्ष रूप से समर्थन कराना हो, फेसबुक की यह कारस्तानियां पुरानी हैं.

फेसबुक के इस हालिया कदम के बाद यह स्पष्ट होता जा रहा है कि विश्व में हो रहे आतंकी हमलों में शिकार हो रही मानवता सिर्फ गैर-मुस्लिम आबादी है. थोड़ा और परिष्कृत करते हुए कहें तो इन हमलों में हलाल हो रही मानवता का आशय सिर्फ उन देशों की जनता से है जिनके सहयोग से वैश्विक आर्थिक नीतियां निर्धारित होती हैं.

यदि फेसबुक की इस मुहिम को एकदम वैध मानते हुए बात करें तो समझ में आता है कि पेरिस हमलों के एक रोज पहले हुए लेबनान की राजधानी बेरुत में हमले में मारे गए 50 शिया मुसलमानों को मानवता से नहीं जोड़ना चाहिए. यह भी एक तथ्य है कि एक हफ्ते पहले रूस के एक हवाईजहाज को बीच हवा में ही मार गिराया गया, लेकिन बेरुत में हुए हमलों की तरह रूसी विमान पर हुआ यह हमला भी मीडिया की खबरों से दूर रहा. दो दिनों पहले बग़दाद में एक शवयात्रा में हुए धमाके में भी 19 निर्दोष मौते हुईं लेकिन इनसे भी मीडिया – खासकर भारतीय मीडिया – नावाकिफ़ है. इससे यह ज़ाहिर है कि सहानुभूति का स्तर – जो कि अब मीडिया से ही निर्धारित हो रहा है – बेरुत, रूस और बग़दाद के मामलों में कहीं नहीं दिख-टिक रहा है.

पैसा उगाही पत्रकारिता के ज़माने में जब अधिकतर चैनलों के पत्रकार लन्दन दौरे के लिए हरे-भरे हो रहे थे, तो वे यह कहीं भूल भी रहे थे कि मीडिया एक हिस्सा उन्हें वॉच भी कर रहा है. फेसबुक की एक सेफ्टी चेक की मुहिम भी है जो लम्बे समय से चली आ रही है. इस बार भी इस मुहिम को सिर्फ पेरिस हमलों के लिए ही एक्टिवेट किया गया है. ऐसे समय में फेसबुक के संस्थापक मार्क ज़ुकरबर्ग की स्पष्ट जवाबदेही भी अपरिहार्य है.

हालांकि मार्क ने अपने फेसबुक प्रोफ़ाइल पर कहा भी है कि लोगों ने उनसे पूछा है कि सिर्फ पेरिस के लिए सेफ्टी चेक का इस्तेमाल क्यों, अन्य जगहों के लिए क्यों नहीं? इस पर मार्क का जवाब है कि हम सभी लोगों के लिए बराबरी से सोचते हैं और इन दुर्घटनाओं में प्रभावित लोगों की हम पूरी शिद्दत से मदद करेंगे. लेकिन मार्क का यह बयान पश्चिमी देशों की आर्थिक ढाँचे और उससे प्रभावित होने वाली सोच का सही विश्लेषण नहीं है.


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